सुभाषितानी
[“सुभाषितानी” शब्द सुभाषित का बहुवचन है, इसका अर्थ ‘कई सुभाषित’ होता है। ‘सुभाषित’ शब्द की उत्पत्ति ‘सु’ और ‘भाषित’ के योग से हुई है जिनका अर्थ क्रमशः सुन्दर, मधुर या प्रिय और वचन, वाणी या कथन होता हैं। इस प्रकार ‘सुभाषित’ का शाब्दिक अर्थ ‘सुंदर या मधुर वचन’ होता है। प्रस्तुत पाठ में सूक्ति मंजरी, नीतिशतकम् , मनुस्मृति: , शिशुपालवधम् , पंचतंत्रम् , से रोचक और विचारपरक श्लोकों को संगृहीत किया गया है।]
Sanskrit Ruchira class 8 first chapter slok no 1.
श्लोक संख्या – 01
गुणा गुणज्ञेषु गुणा भवन्ति ते निगुणं प्राप्य भवन्ति दोषा:।
सुस्वादुतोया: प्रभवन्ति नद्य:
समुद्रमासाद्य भवन्त्यपेया: ।।
*अन्वय:-
गुणा गुणज्ञेषु गुणा ( एव ) भवन्ति ते निर्गुणं प्राप्य दोषा: भवन्ति।
(यथा)नद्य: सुस्वादुतोया: प्रभवन्ति (ता:)समुद्रमासाद्य अपेया: भवन्ति।।
*संधि विच्छेद:-
निर्गुणं = नि: + गुणं
सुस्वादुतोया: = सुस्वादु + तोया:
समुद्रमासाद्य = समुद्रम् + आसाद्य
भवन्त्यपेया: = भवन्ति + अपेया:
* शब्दार्थ:-
गुणा – गुण का बहुवचन।
गुण – सद्गुण, अच्छाई।
गुणज्ञ – गुण के ज्ञानी/गुण को जानने वाला।
गुणज्ञेषु – गुणियों में/गुणवान व्यक्तियों में।
भवन्ति – होते हैं।
ते – वे।
निर्गुणं – गुणहीनों को
प्राप्य – प्राप्त कर, प्राप्त होकर, प्राप्त होने पर।
दोषा: – अवगुण
सुस्वादु – मधुर स्वाद वाले/स्वादिष्ट।
तोया: – जल।
प्रभवन्ति – निकलती हैं।, उत्पन्न होती हैं।
नद्य: – नदियां।
समुद्रम् – समुद्र को, समुद्र में।
आसाद्य – पहुंचकर।
अपेया: – न पीने योग्य।
*श्लोकार्थ / सरलार्थ:-
जिस प्रकार नदियां मधुर स्वाद वाले जल (या स्वदिष्ट जल) के साथ उत्पन्न होती हैं परन्तु समुद्र में पहुंचकर वह जल पीने योग्य नहीं रह जाता हैं। उसी प्रकार सद्गुण गुणवान व्यक्तियों में ही सद्गुण रहता है गुणहीनों को प्राप्त होने पर वे अवगुण हो जाता है।
*व्याख्या :-
प्रस्तुत श्लोक विष्णु शर्मा द्वारा रचित “हितोपदेश” नामक प्रसिद्ध कथा ग्रंथ के ‘मित्रलाभ खंड’ से संग्रहित है। इस श्लोक के द्वारा मनुष्य के जीवन में संगति के प्रभाव का प्रतिपादन किया गया है।
विष्णु शर्मा ने उक्त श्लोक के माध्यम से यह बताने का प्रयत्न किया है कि जिस प्रकार नदियां मधुर स्वाद वाले जल (या स्वदिष्ट जल) के साथ उत्पन्न होती हैं परन्तु समुद्र में पहुंचकर वह जल पीने योग्य नहीं रह जाता हैं। उसी प्रकार सद्गुण गुणवान व्यक्तियों में ही सद्गुण रहता है गुणहीनों को प्राप्त होने पर वे अवगुण हो जाता है। वास्तव में नदी का जल जब समुद्र के खरा पानी का संसर्ग प्राप्त करता है तो उसकी मधुरता समाप्त हो जाती है और उनमें खारापन का दोष आ जाता है, फलत: वह पीने योग्य नहीं रह जाता है। उसी प्रकार सद्गुण भी अपना स्वभाव गुणवान व्यक्तियों के संसर्ग में ही यथावत रख पाता है। गुणहीन व्यक्तियों के सम्पर्क में आने उनमें भी दुर्गुण का दोष आ जाता है।
उपरोक्त श्लोक के माध्यम से हमें यह सीख मिलती है कि हमें गुणवान व्यक्तियों का संसर्ग (अथवा संगति अथवा सान्निध्य) प्राप्त करना चाहिए और गुणहीन व्यक्तियों के संसर्ग (या संगति या सान्निध्य) का त्याग करना चाहिए क्योंकि सद्गुण पर दुर्गुण अधिक प्रबल होता है।
Sanskrit Ruchira class 8 first chapter slok no 2.
श्लोक संख्या – 02
साहित्यसङ्गीतकलाविहीन:
साक्षात्पशु: पुच्छविषाणहीन:।
तृणं न खादन्नपि जीवमान:
तद्भागधेयं परमं पशूनाम्।।
*अन्वयः –
साहित्य संगीत कला विहिन: (जन:) साक्षात् पुच्छ विषानहीन: पशु:। तद् पशूनाम् परमं भागधेयं (अस्ति)। (यत् स:) तृणं न खादन् अपि जीवमान: (अस्ति)।।
*संधि विच्छेद:-
संगीत = सम् + गीत
साक्षात्पशु: = साक्षात् + पशु:
खादन्नपि = खादन् + अपि
तद्भागधेयं = तद् + भाग
*शब्दार्थ:-
विहिन: – रहित, से हीन।
साक्षात् – प्रत्यक्षतः ।
विषाण – सींग।
तृणं – घास को।
खादन् – खाते हुए।
अपि – भी ।
जीवमान: – जीवित रहना या जीवन धारण करना।
तद्/तत् – वह।
पशूनाम् – पशुओं का ।
परमं – परम/श्रेष्ठ।
भागधेयं – सौभाग्य।
* श्लोकार्थ/सरलार्थ:-
साहित्य, संगीत और कला से विहीन व्यक्ति साक्षात पूंछ और सींग से रहित पशु के समान है। यह पशुओं का परम सौभाग्य है कि वह घास नहीं खाते हुए भी जीवित रहता है।
*व्याख्या:-
प्रस्तुत श्लोक संस्कृत साहित्य के प्रसिद्ध कवि और उज्जैन के सम्राट भर्तृहरि द्वारा विरचित “नीतिशतक” से संगृहीत है।
उक्त श्लोक के माध्यम से महाकवि भर्तृहरि ने मनुष्य के जीवन में साहित्य, संगीत और कला के महत्व को रेखांकित किया है। उनके अनुसार साहित्य मनुष्य को उसके भावनात्मक पक्षों को समझाने में सहायक होता है जबकि संगीत उनमें पारस्परिक प्रेम, आत्मीयता और आध्यात्मिकता का संचार करता है। जहां तक ‘कला’ की बात है तो यह आत्मसंतुष्टि और आनन्द के साथ- साथ जीविकापार्जन का भी श्रेष्ठ साधन है। इस प्रकार साहित्य , संगीत और कला मानव जीवन को सफलता के साथ-साथ चरितार्थता प्रदान करने का सर्वोत्तम संसाधन हैं। यदि मनुष्य में इन तीनों चीजों का अभाव हो तो उनमें और पशुओं में सींग तथा पूंछ मात्र का अंतर रह जाता है।
सच तो यह है कि मनुष्य जीवन की सार्थकता अथवा चरितार्थता साहित्य, संगीत और कला में ही निहित है। यदि मनुष्य इन तीनों में से किसी एक का भी सान्निध्य अथवा अधीनता स्वीकार कर ले तो उनके लिए जीवन की जटिलताओं से पार पाना कदापि कठिन नहीं होगा। वर्ग आठ के संस्कृत रुचिरा तृतीयो भाग: में इस श्लोक के समावेश करने का मूल ध्येय बच्चों के सर्वांगीण विकास के मार्ग को प्रशस्त करना है।
Sanskrit Ruchira class 8 first chapter slok no 3
श्लोक संख्या – 03
लुब्धस्य नश्यति यश: पिशुनस्य मैत्री नष्टक्रियस्य कुलमर्थपरस्य धर्म:। विद्याफलं व्यसनिन: कृपणस्य सौख्यं राज्यं प्रमत्तसचिवस्य नराधिपस्य।।
* अन्वयः
लुब्धस्य यश:, पिशुनस्य मैत्री, नष्टक्रियस्य कुलम् , अर्थपरस्य धर्म: , व्यसनिनो विद्याफलं, कृपणस्य सौख्यं, प्रमत्तसचिवस्य नराधिपस्य राज्यं (च) नश्यति।
* संधि विच्छेद :-
कुलमर्थपरस्य = कुलम् + अर्थपरस्य।
नराधिपस्य= नर + अधिपस्य।
* शब्दार्थ:-
लुब्धस्य – लालची का।
पिशुनस्य – निंदक, नीच, चुगलखोर का।
मैत्री – मित्रता।
नष्टक्रियस्य – क्रियाहीन का।
अर्थपरस्य – स्वार्थी, लोभी, अर्थपरायण।
विद्याफलं – विद्या का फल, योग्यता।
व्यसनिन: – बुरी लत वालों/दुराचारियों का ।
कृपणस्य – कंजूस का।
सौख्यं – सुखत्व, सुख, आनन्द।
प्रमत्तसचिवस्य – असावधान या प्रमादयुक्त मंत्री वाले।
नराधिपस्य – राजा का ।
श्लोकार्थ / सरलार्थ :-
लालची के यश, चुगलखोर की मित्रता, क्रियाहीन के कुल, स्वार्थी का धर्म, दुराचारियों के विद्या का फल, कंजूस के आनन्द और असावधान अथवा प्रमादयुक्त मंत्री वाले राजा के राज्य का नाश हो जाता है।
व्याख्या / वर्णन :-
प्रस्तुत श्लोक संस्कृत साहित्य के प्रसिद्ध ग्रंथ “पंचतंत्र” से संगृहीत है जिसके रचनाकार विष्णु शर्मा हैं। यह श्लोक कक्षा आठवीं के प्रथम पाठ सुभाषितानी में पंचतंत्र से लिया गया है।
उक्त श्लोक के माध्यम से विष्णु शर्मा ने बताया है कि यदि किसी व्यक्ति में दुर्गुणों का वास होता है तो उन्हें किन-किन समस्याओं अथवा हानियों का सामना करना पड़ता है। श्लोक में कुछ अवगुणों के उदाहरण देते हुए यह बताया गया है कि यदि किसी व्यक्ति में लालच अर्थात बिना परिश्रम के कुछ पाने की तीव्र इच्छा हो तो उसे अपने यश से हाथ धोना पड़ता है। जब कोई व्यक्ति चुगलखोरी अथवा अंध निंदकता का शिकार हो जाता है तो उसे मित्रहीन होना पड़ता है। क्रियाहीन अर्थात निकम्मे व्यक्ति के वंश की कृति का नाश हो जाता है। अर्थपरायण या स्वार्थी व्यक्ति के धर्म कलंक का दोष लगता हैं। दुराचारियों अथवा बुरी लत वाले व्यक्ति के विद्या का फल यानी शैक्षणिक उपलब्धियों से विहीन होना पड़ता है। कंजूस व्यक्ति धनार्जन के वशीभूत होकर अपने को सामान्य आवश्यकताओं की आपूर्ति से दूर रखकर आनन्द के सम्पूर्ण अवसर समाप्त कर बैठते हैं। इस श्लोक के अंत में प्रमादयुक्त मंत्री के कारण राजा और उसके राज्य पर पड़ने वाले प्रभाव का प्रतिपादन किया गया है। विष्णु शर्मा के अनुसार जिस राज्य के मंत्री प्रमादयुक्त अर्थात मतवाले होते हैं उस राज्य और राजा दोनों का नाश निश्चित है।
इस प्रकार उक्त श्लोक के माध्यम से यह बताने का प्रयत्न किया गया है कि अपने यश की चिंता करने वाले व्यक्ति को लालच से, मित्रता की इच्छा रखने वालों को चुगलखोरी से, वंश की चिंता करने वाले को क्रियाहीनता से, धर्म की चिंता करने वाले को अर्थपरायणता या स्वार्थ से, शैक्षणिक उपलब्धियों के लाभार्थियों को दुराचार से, आनन्द के आकांक्षा रखने वाले को कंजूसी से और अपने राज्य की समृद्धि चाहने वाले राजा को अपने उन्मत्त मंत्रियों से बचना चाहिए।
Sanskrit Ruchira class 8 first chapter slok no 4
श्लोक संख्या – 04
पीत्वा रसं तु कटुकं मधुरं समानं माधुर्यमेव जनयेन्मधुमक्षिकासौ। सन्तस्तथैव समसज्जनदुर्जनानां। श्रुत्वा वच: मधुरसूक्तरसं सृजन्ति।।
अन्वय: –
असौ मधुमक्षिका तु कटुकं रसं मधुरं समान पीत्वा माधुर्यमेव जनयेत् तथा एव सन्त: सम सज्जन दुर्जनानां वच: श्रुत्वा मधुर सूक्तरसं सृजन्ति।
संधि-विच्छेद :-
माधुर्यमेव = माधुर्यम् + एव।
जनयेन्मधुमक्षिकासौ = जनयेत् + मधुमक्षिका + असौ।
सन्तस्तथैव= संत: + तथा + एव।
दुर्जनानां = दु: + जनानां ।
सज्जन = सत् + जन।
शब्दार्थ :-
असौ – वह।
मधुमक्षिका – मधुमक्खी।
जनयेत् – उत्पन्न करती हैं।
माधुर्यम् – शहद को।
पीत्वा – पीकर।
कटुकं – कड़वा।
तथा – वैसे।
एव – ही।
तथैव – वैसे ही।
दुर्जनानां – दुर्जनों / दुष्टों के।
वच: – वचन।
मधुरसूक्तरसं – मधुर, सुन्दर और सरस।
सृजन्ति – सृजन करते हैं।
श्लोकार्थ/सरलार्थ :-
जिस प्रकार मधुमक्खी कड़वा और मीठा (दोनों प्रकार के) रसों को पीकर एक समान मधुर शहद उत्पन्न करते हैं उसी प्रकार संत पुरुष सज्जन और दुर्जन दोनों के वचनों को सुनकर मधुर, सुन्दर और सरस वचनों का सृजन करते हैं।
व्याख्या /वर्णन :-
प्रस्तुत श्लोक का संग्रहण महाकवि भर्तृहरि के ‘नीतिशतकम्’ नामक प्रसिद्ध ग्रंथ से हुआ है। जिसमें संतों के स्वभाव का चित्रण किया गया है। यह श्लोक हमारी पाठ्य-पुस्तक वर्ग आठ के प्रथम अध्याय सुभाषितानी में नीतिशतकम् से ही लिया गया है।
उक्त श्लोक के माध्यम से संत पुरुष के स्वभाव को मधुमक्खियों के उदाहरण के साथ बताया गया है। श्लोक के अनुसार जिस प्रकार वह मधुमक्खी कड़वा और मीठा दोनों प्रकार के रसों को पीकर एक समान मधुर शहद का निर्माण करते हैं उसी प्रकार संत पुरुष सज्जन और दुर्जन दोनों के वचनों को सुनकर सुन्दर, मधुर और सरस वचनों का ही सृजन करते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि संत स्वभावत: निष्पक्ष होते हैं वे सज्जन और दुर्जन का भेद किए बिना सबों की भलाई और उपकार की बात करते हैं।
Sanskrit Ruchira class 8 first chapter slok no 5.
श्लोक संख्या – 05
विहाय पौरुषं यो हि दैवमेवावलम्बते। प्रासादसिंहवत् तस्य मूर्ध्नि तिष्ठंति वायसा:।।
अन्वय :-
यो पौरुषं विहाय हि दैवम् एव अवलम्बते ।
प्रासादसिंहवत् तस्य मूर्ध्नि तिष्ठंति वायसा: ।।
संधि-विच्छेद :-
दैवमेवावलम्बते = दैवम् + एवं + अवलम्बते।
शब्दार्थ :-
यो – जो।
पौरुषं – पुरुषार्थ, परिश्रम, उद्यम।
विहाय – छोड़कर।
दैवम् – भाग्य, प्रारब्ध।
एव – ही , केवल।
हि – ही, निश्चित रूप से, निश्चय ही।
अवलम्बते – निर्भर रहते हैं।
प्रासादसिंहवत् – भवन के द्वार स्थित सिंह की मूर्ति के समान।
तस्य – उसके, जिसके ।
मूर्ध्नि – सर पर।
तिष्ठंति – बैठते हैं।
वारसा: – कौए।
श्लोकार्थ / सरलार्थ :-
जो पुरुष अपने पुरुषार्थ अर्थात परिश्रम को छोड़कर केवल भाग्य पर आश्रित रहते हैं, उसकी दशा निश्चित रूप से राजभवन के द्वार स्थित सिंह की उस मूर्ति के समान होती है जिसके सिर पर कौए बैठते हैं।
व्याख्या/वर्णन :-
प्रस्तुत श्लोक संस्कृत साहित्य के प्रसिद्ध ग्रंथ “हितोपदेश” के “मित्र लाभ” खंड से संगृहीत है। इस प्रसिद्ध ग्रंथ के रचनाकार नारायण पंडित है। उक्त श्लोक का हमारी कक्षा अष्टम् की संस्कृत पाठ्य-पुस्तक रुचिरा भाग 3 में संकलन हुआ है।
उक्त श्लोक के माध्यम से भाग्य के स्थान पर कर्म की प्रधानता को प्रतिपादित किया गया है। नारायण पंडित के अनुसार जो मनुष्य अपने पुरुषार्थ अर्थात परिश्रम को त्याग कर केवल भाग्य पर आश्रित रहते हैं, उसकी दशा राजभवन के द्वार पर स्थित उस निर्जीव सिंह की मूर्ति के समान होती है, जिसके सिर पर कौए बैठ जाते हैं परन्तु वे उस कौए का कुछ नहीं कर पाते हैं। जिस प्रकार राजभवन के द्वार पर स्थित सिंह की मूर्ति सिंह होते हुए भी अपने सिर पर बैठे कौए का प्रतिकार करने में असमर्थ रहता है उसी प्रकार आलसी व्यक्ति शारीरिक और मानसिक रूप से सामर्थ्यवान होते हुए भी अपनी सामान्य आवश्यकताओं की पूर्ति में असमर्थ होते हैं।
इस प्रकार उक्त श्लोक के माध्यम से उत्कृष्ट उदाहरण के द्वारा व्यक्तियों को परिश्रम के प्रति जागरूक करने का प्रयत्न किया गया है।
Sanskrit Ruchira class 8 first chapter slok no 06
श्लोक संख्या – 06
पुष्पपत्रफलच्छायामूलवल्कलदारुभि:।
धन्या महीरुहा: येषां विमुखं यान्ति नार्थिन:।।
अन्वय: –
पुष्पै: पत्रै: फलै: छायया मूलै: वल्कलै: दारुभि: च। (एत/एतत्) महीरुहा: धन्या: येषाम् आर्थिन: विमुख: न यान्ति।।
संधि-विच्छेद :-
नार्थिन: = न + अर्थिन:
यान्ति = या + अन्ति
महीरुहा: = यही + रुहा:।
शब्दार्थ:-
पुष्पै: – फूलों से।
पत्रै: – पत्तियों से।
छायया – छांवों से।
मूलै: – जड़ों से।
वल्कलै: – छालों से।
दारुभि: – लकड़ियों से।
च – और।
एत/एतत् – यह।
मही – पृथ्वी, धरती ।
रुहा: (रुह् धातु से उत्पन्न) – उगने वाला।
महीरुहा: – वृक्ष।
अर्थिन: – याचक, मांगने वाले।
येषां – जिनके।
विमुखं – निराश।
न – नहीं।
यान्ति – होते हैं, लौटते हैं।
श्लोकार्थ/सरलार्थ:-
फूलों, पत्तियों, फलों, छांवों, जड़ों, छालों और लकड़ियों से युक्त यह वृक्ष धन्य है जिनके याचक निराश नहीं लौटते हैं।
व्याख्या/वर्णन :-
प्रस्तुत श्लोक श्रीमद् भागवत महापुराण दशम स्कन्ध के अध्याय संख्या 22 से संग्रहित है जिसमें श्रीकृष्ण भगवान ने अपने सखाओं से वृक्ष के त्याग का वर्णन किया है। इस श्लोक का संग्रहण वर्ग आठ के संस्कृत पुस्तक रूचिरा भाग 3 में सुभाषितानी शीर्षक पाठ में उक्त ग्रंथ से हुआ है।
उक्त श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण ने अपने सखाओं को संबोधित करते हुए कहा हैं कि फूलों, पत्तियों, फलों, छांवों, जड़ों, छालों और लकड़ियों से युक्त यह वृक्ष धन्य है जिनके याचक निराश नहीं लौटते हैं। भगवान श्रीकृष्ण के अनुसार वृक्ष चेतना शून्य होकर भी अपना सर्वस्व समर्पण करते हैं। यह हम सबों के लिए निस्वार्थ परोपकार का उत्कृष्ट उदाहरण है। उक्त श्लोक से हमें निस्वार्थ सेवा की सीख मिलती है।
Sanskrit Ruchira class 8 first chapter slok no 7
श्लोक संख्या -07
चिन्तनीया हि विपदाम् आदावेव प्रतिक्रिया:। न कूपखननं युक्तं प्रदीप्ते वह्निना गृहे।।
अन्वय:-
विपदाम् आदौ एव हि प्रतिक्रिया: चिन्तनीया। गृहे वहि्नना प्रदीप्ते कूपखननं न उपयुक्तम्।।
संधि विच्छेद:-
आदावेव = आदौ+एव।
शब्दार्थ:-
विपदाम् – विपत्तियों / संकटों के।
आदौ – पूर्व में, पहले।
एव – ही।
हि – निश्चित रूप से, क्योंकि।
प्रतिक्रिया: – प्रतिकार, उपाय, समाधान।
चिन्तनीया – चिंतन करने योग्य, विचार करने योग्य, विचार करने योग्य।
प्रदीप्ते – प्रज्वलित, जलते हुए।
गृहे – घर में।
न – नहीं।
कूपखननं – कुआं खोदना।
युक्तं – उचित, उपयुक्त, न्यायसंगत।
श्लोकार्थ/सरलार्थ:-
विपत्तियों के आने से पहले ही उनके उपाय या समाधान का चिंतन करना चाहिए क्योंकि घर में आग लगने के पश्चात कुआं खोदना उचित नहीं है।
व्याख्या/वर्णन :-
प्रस्तुत श्लोक संस्कृत के प्रसिद्ध नीति ग्रंथ “चाणक्य नीति” से संगृहीत है जिसके रचनाकार आचार्य चाणक्य है। संस्कृत रूचिरा भाग 3 के प्रथम पाठ सुभाषितानी में इस श्लोक का संग्रहण उक्त ग्रंथ से ही हुआ है।
उक्त श्लोक के माध्यम से मनुष्यों में प्रबंधन संबंधित कौशल को अधिक प्रभावी बनाने पर बल दिया गया है ताकि कार्यसिद्धि के समय किसी तरह का व्यवधान उत्पन्न न हो। चतुर व्यक्ति अपने किसी कार्य को संपादित करने से पहले उसकी पूरी तैयारी कर लेते हैं क्योंकि उसे पता रहता है कि विपत्तियों के आने से पहले ही उनके उपाय या समाधान का चिंतन करना चाहिए क्योंकि घर में आग लगने के पश्चात कुआं खोदना उचित नहीं है।
योग्यता विस्तार:-
येषां न विद्या न तपो न दानं ज्ञानं न शीलं न गुणों न धर्म:।
ते मर्त्यलोके भुवि भारभूता: मनुष्यरुपेण मृगाश्चरन्ति।।
शब्दार्थ (संधि विच्छेद सहित):-
येषां – जिनको।
न – नहीं।
तपो – तप, तपस्या, साधना।
शीलं – सुन्दर स्वभाव।
गुणो – सद्गुण, अच्छाई।
ते – वे।
मर्त्यलोके – मनुष्यलोक में, मृत्युलोक में।
भुवि – पृथ्वी पर।
भारभूता – भार स्वरुप।
मृगाश्चरन्ति = मृगा: + चरन्ति।
मृगा: – पशुओं (की तरह)।
चरन्ति – आचरण करते हैं।
श्लोकार्थ / सरलार्थ:-
वैसे मनुष्य जिनके पास विद्या, साधना, दान, ज्ञान, सुन्दर स्वभाव, सद्गुण, धर्म इत्यादि न हो, वे इस मनुष्यलोक में पृथ्वी पर भार स्वरुप मनुष्य के रूप में पशुओं की तरह आचरण करते हैं।
व्याख्या/वर्णन:-
प्रस्तुत श्लोक संस्कृत के प्रसिद्ध नीति ग्रंथ “नीति शतकम्” के प्रथम शतक से संगृहीत है। जिसके रचनाकार आचार्य भर्तृहरि है।
उक्त श्लोक के माध्यम से भर्तृहरि ने मनुष्य के मनुष्यता के लिए आवश्यक सद्गुणों का उल्लेख किया है। उसके अनुसार जिस मनुष्य के पास विद्या (शिक्षा), तप (साधना), दान (उदारता), ज्ञान (विवेक), शील (सुन्दर स्वभाव), गुण (अच्छाई), धर्म (कर्म ज्ञान) इत्यादि न हो वे इस मनुष्यलोक अथवा मृत्यु लोक में भूमि पर भार स्वरुप मनुष्य के रूप में पशुओं की तरह आचरण करते हैं।
इस श्लोक के माध्यम से हमें बताया गया है कि मनुष्य में शिक्षा, साधना, उदारता, विवेक, सुन्दर स्वभाव, सद्गुण, धर्म ज्ञान इत्यादि के बिना उसमें और पशु में केवल शारीरिक अंतर रह जाता है।
प्रश्नोत्तरी :-
2. श्लोकांशेषु रिक्तस्थानानि पूरयत-
(क) समुद्रमासाद्य……………….।
उत्तर – भवन्त्यपेया।
(ख) ………वच: मधुसूक्तरसं सृजन्ति।
उत्तर – श्रुत्वा।
(ग) तद्भागधेयं ………………. पशूनाम्।
उत्तर – परमं।
(घ) विद्याफलं……….कृपणस्य सौख्यम्।
उत्तर – व्यसनिन:।
(ङ) पौरुषं विहाय य: ………… अवलम्बते।
उत्तर – दैवमेव ।
(च) चिन्तनीया हि विपदाम्………… प्रतिक्रिया:।
उत्तर – आदावेव।
3.प्रश्नानां उत्तराणि एकपदेन लिखत –
(क) व्यसनिन: किं नश्यति? (बुरी आदत वालों का क्या नाश होता है?)
उत्तर – विद्याफलं
(ख) कस्य यश: नश्यति? (किसका यश नष्ट होता है?)
उत्तर – लुब्धस्य।
(ग)मधुमक्षिका किं जनयति? (मधुमक्खी क्या उत्पन्न करती है?)
उत्तर – माधुर्यम् (शहद)
(घ) मधुरसूक्तरसं के सृजन्ति? ( मधुर, सुन्दर और सरस वाणी कौन बोलते हैं?)
उत्तर – सन्त:
(ङ) अर्थिन: केभ्य: विमुखा न यान्ति? (याचक/मांगने वाले किससे निराश होकर नहीं लौटते हैं?)
उत्तर – महीरुहा: (वृक्षा:)