बहादुर

बहादुर (Bahadur):-

 

‘बहादुर’ शीर्षक कहानी का प्रश्नोत्तर :-

प्रश्न संख्या – 1

लेखक को क्यों लगता है कि जैसे उस पर एक भारी दायित्व आ गया हो?

उत्तर – लेखक के लिए कई कारणों से अपनी पत्नी निर्मला हेतु एक नौकर रखना अनिवार्य हो गया था और सौभाग्यवश बहादुर के रूप में उसे एक नौकर मिल भी गया था। लेकिन लेखक नौकर का अर्थ भली-भांति समझता है कि वह भी घर के सवांग की तरह ही होता है।
                  अतः स्वामी धर्म के पालन के रूप में लेखक को लगता है कि जैसे उस पर भारी दायित्व आ गया हो।

स्पष्टीकरण :- लेखक की पत्नी निर्मला लेखक से बार-बार एक नौकर लाने की जिद्द किया करती थी। लेखक अपनी बहन के विवाह समारोह में जब घर गए थे तब वहां उसे नौकर का सुख देखने को मिला। बड़े पद पर कार्यरत रहने के कारण लेखक के दोनों भाइयों के साथ उनके नौकर थे जिस कारण उनकी पत्नियों को अधिक काम नहीं करना पड़ता था लेकिन निर्मला को देर रात तक काम करना पड़ता था। इससे लेखक का मन खीझकर रह जाता था। लेखक ने उसी समय एक नौकर लाने का विचार कर लिया था। सौभाग्यवश उनके साले साहब बहादुर के रूप में एक नौकर ले आता है। अब लेखक के सामने स्वामी धर्म के पालन का प्रश्न खड़ा हो गया। लेखक के घर में नौकर-चाकर को सम्मान पूर्वक रखने की परम्परा रही है। सो लेखक यह सोचकर चिंतित हो उठता है कि वह स्वामी धर्म का पालन कर पाएंगे कि नहीं, यदि नौकर का स्वभाव अच्छा नहीं होगा तो क्या होगा? यदि नौकर अधिक दिनों तक नहीं रह पाए तो लोग क्या कहेंगे? आदि-आदि प्रश्नों के कारण उन्हें लगता है कि जैसे उस पर एक भारी दायित्व आ गया हो।

प्रश्न संख्या – 2

अपने शब्दों में पहली बार दिखे बहादुर का वर्णन कीजिए।

उत्तर – बहादुर पहली बार जब लेखक के घर आया था तो उस समय उसकी आयु लगभग 12-13 वर्ष थी। लेखक के परिवार के सदस्यों के बीच घिरा वह अपनी आंखों को बुरी तरह मलका (मटका) रहा था। वह छोटे कद-काठी का एक गोल-मटोल बालक था। उसका रंग गोरा और मुंह चपटा था। उसने सफेद नेकर, आधी बांह वाली कमीज और भूरे रंग के पुराने जूते पहन रखा था। उसके गले में स्काउट गाइड के बालकों की भांति एक रुमाल बंधा हुआ था।
                                उसके हाव-भाव और भेष-भूषा से यह सिद्ध होता था कि वह एक निर्धन और अनपढ़ बालक था।

प्रश्न संख्या – 3

लेखक को क्यों लगता है कि नौकर रखना बहुत जरूरी हो गया था?

उत्तर – लेखक के भाईयों और अन्य रिश्तेदारों के यहां नौकर थे, इस कारण उनकी पत्नियों को बहुत आराम मिलता था जबकि लेखक की पत्नी निर्मला अधिक काम करने के कारण अस्वस्थ रहने लगी थी और हमेशा एक नौकर रखने की हठ करती थी।
                     इन्हीं कारणों से लेखक को लगता है कि नौकर रखना बहुत जरूरी हो गया था।

प्रश्न संख्या – 4

साले साहब से लेखक को कौन सा किस्सा असाधारण विस्तार से सुनना पड़ा?

उत्तर – साले साहब से लेखक को बहादुर का घर से भागकर यहां तक आने का किस्सा असाधारण विस्तार से सुनना पड़ा।

प्रश्न संख्या – 5

बहादुर अपने घर से क्यों भाग गया था?

उत्तर – बहादुर की मां गुस्सैल स्वभाव की थी। वह बहादुर से घरेलू कामों में सहयोग की अपेक्षा रखती थी परन्तु बहादुर प्रायः यत्र – तत्र भटकते रहते थे। एक दिन भैंस चराने के क्रम में बहादुर ने उस भैंस की बहुत पिटाई कर दी जिस भैंस को उसकी मां बहुत प्यार करती थी।भैंस की मार से आहत मां ने बहादुर की भैंस की दोगुनी पिटाई कर दी और उसे वहीं कराहता छोड़कर घर लौट गई। मां के इस निर्ममता से बहादुर का मां से मन फट गया और उसने घर छोड़ने का मन बना लिया।
                       इस प्रकार मां की निर्ममता पूर्वक पिटाई के कारण बहादुर अपने घर से भाग गया था।

प्रश्न संख्या – 6

बहादुर के नाम से ‘दिल’ क्यों उड़ा दिया गया? विचार कीजिए।

उत्तर – सामान्यतः पारिवारिक जीवन में ऐसा देखा जाता है कि लोग बोलचाल के दौरान अपने बच्चों को बड़े नाम की बजाय छोटे नाम से संबोधित करना अधिक पसंद करते हैं। क्योंकि बड़े नाम को याद रखने और उच्चारण करने में कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है। हालांकि नौकर – चाकर के मामले में ये बातें लागू नहीं होती वहां लोग अपने को श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए जानबूझकर नौकर – चाकरों के नाम के कुछ हिस्सों उड़ा देते हैं, क्योंकि पूरा नाम सम्मान बोधक होता है।
                         संभवतः बहादुर के नाम से ‘दिल’ शब्द उक्त कारणों से उड़ा दिया गया।

प्रश्न संख्या – 7

सप्रसंग व्याख्या करें।

(क) उसकी हंसी बड़ी कोमल और मिठी थी, जैसे फूल की पंखुड़ियां बिखर गई हों।

उत्तर – प्रस्तुत पंक्ति गोधूलि भाग – 2 में संकलित ‘बहादुर’ शीर्षक कहानी से ली गई है। जिसके रचयिता हिन्दी साहित्य के मूर्धन्य कथाकार अमरकांत जी है।
                                        उक्त पंक्ति का उल्लेख लेखक ने बहादुर नामक नौकर के प्रसंग में किया है। लेखक के अनुसार जब शाम के समय वे दफ्तर से लौटते थे तो बहादुर घर के किसी सदस्य का कोई साधारण शिकायत करके ऐसे हंसने लगता था मानो उसने किसी बड़े रहस्य को उजागर कर दिया हो। लेखक को बहादुर की यह हंसी बहुत आकर्षित करती थी। वास्तव में बच्चों का हृदय छल-प्रपंच, ईर्ष्या-द्वेष आदि अवगुणों से विहीन होते हैं। इसलिए उसकी हंसी सबों को इतनी भाती है।
                            बहादुर के मनमोहक मुस्कान के माध्यम से लेखक ने उसके सरल और सहज स्वभाव का वर्णन किया है।

(ख) पर अब बहादुर से भूल-गलतियां अधिक होने लगी थी।

उत्तर – प्रस्तुत पंक्ति गोधूलि भाग में संकलित ‘बहादुर’ शीर्षक पाठ से संबंधित है। जिसके रचयिता हिन्दी साहित्य के सशक्त कथाकार अमरकांत जी है।
               उक्त पंक्ति के माध्यम से कहानीकार ने बहादुर के साथ हुए बुरे व्यवहार और उसके दुष्प्रभाव का वर्णन किया है। लेखक के अनुसार जब तक घरवालों ने बहादुर के साथ अच्छा व्यवहार किया तब तक उसके कार्य में कोई गड़बड़ी नहीं हुई। वे सुबह से लेकर देर रात तक काम करते थे। लेकिन जैसे – जैसे उसके साथ मार-पीट और गाली-गलौज जैसे असहनीय घटनाएं घटने लगी वैसे – वैसे उनकी कार्य – कुशलता भी प्रभावित होने लगी। अब वे असुरक्षा, अविश्वास आदि आशंकाओं से घिरे रहने के कारण सहज भाव से कोई काम नहीं कर पाते हैं। परिणामस्वरूप उनसे गलतियां अधिक होने लगी।
                            लेखक ने इस प्रसंग के माध्यम से इस प्रकार की समस्याओं के लिए एक मनोवैज्ञानिक हल प्रस्तुत किया है। उनके अनुसार किसी काम को सही ढंग से करने के लिए सहज भाव का होना परम आवश्यक है और ‘सहज भाव’ मार-पीट या गाली-गलौज या दंड आदि की बजाय प्रेम, प्रशंसा, अपनापन आदि के द्वारा ही संभव है।

(ग) अगर वह कुछ चुराकर ले जाता तो संतोष हो जाता।

उत्तर – प्रस्तुत पंक्ति गोधूलि भाग -2 में संकलित ‘बहादुर’ शीर्षक पाठ से सम्बद्ध है। इसके रचयिता हिन्दी साहित्य सिंधु के सिद्धहस्त साहित्यकार अमरकांत जी है।
          उक्त पंक्ति का प्रयोग लेखक ने निर्मला के पश्चाताप के प्रसंग में किया है। लेखक के घर काम करते हुए बहादुर ने कभी अपने नैतिक मूल्यों से समझौता नहीं किया। सदैव ईमानदारी और सत्यनिष्ठा का पालन किया । इसके बाद भी लेखक के रिश्तेदारों के द्वारा उस पर चोरी का मिथ्या और मनगढ़ंत आरोप लगाया जाता हैं। लेखक और परिवार के अन्य सदस्य सबकुछ जानते हुए भी उसका बचाव करने की बजाय उसके साथ मारपीट करते हैं। इस मिथ्या आरोप से मर्माहत होकर बहादुर ने एक दिन बिना कुछ लिए लेखक का घर छोड़ दिया।
                 किसी की बहकावे में अतिशीघ्र आ जाना मध्यमवर्गीय परिवार की कड़वी सच्चाई है परन्तु अपनी भूल का भान (आभास) होने पर तत्क्षण पश्चाताप करना उनकी भारी विशेषता है। लेखक की पत्नी निर्मला की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है। बहादुर के बिना वेतन आदि लिए चले जाने पर वे स्वयं को हीन भावना से देखने लगती है। बहादुर के त्याग और उपकार के भार ने उनकी प्रसुप्त नारीत्व को जागृत कर दिया।

(घ) यदि मैं न मारता, तो शायद वह न जाता।

उत्तर – प्रस्तुत पंक्ति अधिग्रहण गोधूलि भाग – 2 में संकलित ‘बहादुर’ शीर्षक कहानी से किया गया है। इसकी रचना हिन्दी साहित्य के लब्धप्रतिष्ठित कहानीकार अमरकांत जी के द्वारा की गई है।
                    उक्त पंक्ति का प्रयोग लेखक ने अपने पश्चाताप के प्रसंग में किया है। लेखक ने बहादुर के मनोभाव का वर्णन करते हुए कहा है कि निर्मला और बहादुर से बार-बार प्रताड़ित होने के बाद भी बहादुर ने कभी घर नहीं छोड़ा क्योंकि उसे लगता था कि गृहस्वामी (लेखक) उसके साथ है। परन्तु रिश्तेदारों के मिथ्या आरोप के कारण गृहस्वामी ने जब उस पर हाथ छोड़ दिया तब उसने उसका घर छोड़ दिया।
       बहादुर के चले जाने पर लेखक को अपनी गलती का आभास होता है। अपनी गलती पर पश्चाताप करते हुए लेखक ने कहा कि ‘यदि मैं न मारता, तो शायद वह न जाता।’

प्रश्न संख्या – 8

काम-धाम के बाद रात को अपने बिस्तर पर गये बहादुर का लेखक किन शब्दों में चित्रण करता है? चित्र का आशय स्पष्ट करें।

उत्तर – लेखक काम – धाम के बाद रात को अपने बिस्तर पर पर गये बहादुर का चित्रण बाल सम्मत शब्दों में करता है। लेखक के अनुसार रात के समय बहादुर अंदर के बरामदे में एक टूटी बंसखट पर अपना बिस्तर लगाता था। फिर उस पर बैठकर अपनी जेब से एक गोल – सी बाईं ओर झुकी हुई नेपाली टोपी निकाल कर पहनता था। टोपी पहनकर एक छोटे – से आईने में बंदर की तरह अपना मुंह देखता था। फिर प्रसन्न होकर कुछ गोलियों, पुराने ताश की गड्डी, कुछ खूबसूरत पत्थर के टुकड़ों, ब्लेड, कागज की नावों आदि से खेलने लगता था। कुछ देर खेलने के बाद धीमे स्वर में गुनगुनाने लगते थे। लेखक उन पहाड़ी गानों का अर्थ नहीं समझ पाते थे लेकिन घर में फैली उसकी मीठी उदासी से अनुभव करता था, मानो कोई पहाड़ की निर्जनता में अपने किसी बिछुड़े साथी को पुकार रहे हों।

                                         प्रस्तुत चित्र का आशय बाल स्वभाव का उल्लेख करने के साथ – साथ बहादुर के अपने घर, समाज, माता आदि के प्रति उनके लगाव को प्रदर्शित करना है।

प्रश्न संख्या – 9

बहादुर के आने से लेखक के घर और परिवार के सदस्यों पर कैसा प्रभाव पड़ा?

उत्तर – बहादुर के आने से लेखक का घर पहले की अपेक्षा अधिक साफ-सुथरा रहने लगा था। घर में रखे कपड़े, बर्तन, जूते आदि चमकने लगे थे। आराम मिलने के कारण निर्मला के सेहत में भी निरंतर सुधार हो रहा था। परिवार के किसी सदस्य को काम-धाम की परवाह नहीं थी। अब रात के समय सभी सवेरे सोने चले जाते थे और सुबह देर से उठते थे।
                                इस तरह बहादुर के आने से लेखक के घर और परिवार के सदस्यों पर अभूतपूर्व प्रभाव पड़ा।

प्रश्न संख्या -10

किन कारणों से बहादुर ने एक दिन लेखक का घर छोड़ दिया?

उत्तर – बहादुर एक आत्मस्वाभिमानी और कर्तव्यनिष्ठ बालक था। लेखक के घर निष्ठापूर्वक काम करने के बाद भी उसके साथ प्रायः मारपीट, गाली-गलौज आदि की जाती थीं। इतना ही नहीं घर आए रिश्तेदार के द्वारा उन पर चोरी का आरोप लगाया जाता है।
                             बहादुर ने इन्हीं कारणों से आहत होकर एक दिन लेखक का घर छोड़ दिया।

प्रश्न संख्या – 11

बहादुर पर ही चोरी का आरोप क्यों लगाया जाता है और उस पर इस आरोप का क्या असर पड़ता है?

उत्तर – लेखक के घर आए रिश्तेदारों के द्वारा बहादुर पर ही चोरी का आरोप लगाया जाता है क्योंकि बहादुर एक नौकर था। रिश्तेदारों ने सोचा बहादुर पर चोरी के आरोप लगने से सभी सहजता पूर्वक विश्वास कर लेंगे। किसी को कोई आपत्ति नहीं होगी क्योंकि वहां बहादुर का साथ देने वाला कोई नहीं था। (नौकर के प्रति समाज में एक मान्य धारणा है कि वह ईमानदार नहीं हो सकता। बहादुर भी इसी धारणा का शिकार बन गया।)
                               इस आरोप का उस पर बड़ा व्यापक असर पड़ता है। इस आरोप से आहत होकर उसने वेतन आदि का रकम लिए बिना लेखक का घर छोड़ दिया।

प्रश्न संख्या – 12

घर आए रिश्तेदारों ने कैसा प्रपंच रचा और उसका क्या परिणाम निकला?

उत्तर – लेखक के घर आए रिश्तेदारों ने अपनी लाज छिपाने के लिए पैसे चोरी का प्रपंच रचा। इस प्रपंच के परिणाम स्वरूप लेखक को बहादुर जैसे ईमानदार, कर्मठ और कर्मनिष्ठ नौकर से हाथ धोना पड़ता है।

प्रश्न संख्या – 13

बहादुर के चले जाने पर सबको पछतावा क्यों होता है?

उत्तर – बहादुर एक ईमानदार, कर्मठ और कर्मनिष्ठ नौकर था। वह मारपीट, गाली-गलौज जैसे दुर्व्यवहारों के बाद भी निष्ठापूर्वक सबों की आज्ञा का पालन करता था। उसके रहते घर में सबको बहुत आराम मिलता था। अब उसके जैसे नौकर शायद ही मिलेगा। जब उसने रिश्तेदारों के प्रपंच से आहत होकर लेखक का घर छोड़ दिया तब सबको अपनी गलतियों का आभास होता है।
                 इसलिए बहादुर के चले जाने पर सबको पछतावा होता है।

प्रश्न संख्या – 14

बहादुर, किशोर, निर्मला और कथावाचक का चरित्र चित्रण करें।

बहादुर का चरित्र चित्रण करें।

उत्तर – बहादुर हिन्दी साहित्य के सशक्त कथाकार अमरकांत जी के द्वारा विरचित ‘बहादुर’ शीर्षक कहानी का नायक पात्र है। कहानी का सम्पूर्ण कथानक बहादुर के इर्द-गिर्द घूमता है। कहानी के आरम्भिक अवस्था में उसका परिचय ‘दिलबहादुर’ के रूप में होता है। हालांकि लेखक की पत्नी निर्मला के द्वारा दो-चार व्यावहारिक उपदेश के बाद उसके नाम से ‘दिल’ शब्द उड़ा दिया जाता है। वह मूलतः नेपाल का रहने वाला है, उसे लेखक के साले साहब के द्वारा लेखक के घर ‘नौकर’ के रूप में लाया जाता है। वह अपनी मां की पिटाई के कारण अपने घर से भागकर आया हुआ था, जिस कारण एक पुत्र के रूप में अपनी मां के प्रति उनका स्वाभाविक जुड़ाव दृष्टिगोचर नहीं होता है परन्तु अपनी मां के प्रति कर्तव्य बोध का भाव उनमें कूट-कूटकर भरा हुआ है। इस कर्तव्य बोध का प्रमाण हमें तब मिलता है जब उसके द्वारा निर्मला से अपनी मां के पास यह कहते हुए पैसे भेजने को कहा जाता है कि मां-बाप का कर्जा तो जन्मभर भरा जाता है। सामान्य बच्चों की तरह उनमें भी भोलापन, संवेदनशीलता, स्वाभिमान आदि मौजूद है।
                      लेखक के सामने उसके परिवार के किसी सदस्य की छोटी-मोटी शिकायत करना और फिर इसे अपनी बड़ी उपलब्धि मानकर हंसने की घटना उसके भोलेपन को दर्शाता है। अपने घर से लेखक के घर तक उसके साथ हुई मारपीट से यह सिद्ध हो जाता है कि उसके साथ मारपीट करके उससे ठीक ढंग से काम नहीं लिया जा सकता है। यह उसके संवेदनशीलता को प्रदर्शित करता है। मां द्वारा निर्दयतापूर्वक पिटाई के पश्चात बाद में ही कराहता छोड़कर घर लौट जाना और प्रतिक्रिया स्वरूप उसका घर छोड़ देना, किशोर की गालियों का लेखक के सामने निडरतापूर्वक प्रतिकार करना, रिश्तेदारों के द्वारा चोरी के आरोप से आहत होकर लेखक का घर छोड़ देना आदि कुछ ऐसी घटनाएं हैं जो उसके आदर्श आत्मस्वाभिमान को उजागर करती हैं।
                  बहादुर के वास्तविक चरित्र का परिचय कहानी के अंतिम चरण में मिलता है, जब वह लेखक का घर छोड़कर चला जाता है तब सबों को अपनी गलती का आभास होता है। सभी अपने किए दुर्व्यवहार के बारे में सोचकर शर्मिंदा होते हैं। लेखक सहित परिवार के सभी सदस्यों के द्वारा बहादुर की कर्मनिष्ठा की सराहना करुण कंठ से की जाती है। लेखक और निर्मल के पश्चाताप के आंसू ने बहादुर पर लगे दाग को गंगाजल की तरह पवित्र कर दिया। आध्यात्मिक सृष्टि में पश्चाताप को मुक्ति का सबसे सहज और उत्तम उपाय बताया गया है।

किशोर का चरित्र चित्रण करें।

उत्तर – हिन्दी साहित्य के सशक्त कथाकार अमरकांत द्वारा विरचित ‘बहादुर’ शीर्षक कहानी में किशोर एक खल पात्र है। लेखक ने उसका परिचय अपने बड़े लड़के के रूप में दिया है। वह कालेज में पढ़ाई करता है परन्तु व्यवहारिक ज्ञान का उसमें घोर अभाव है। उन्हें कालेज के सामान्य छात्रों की तरह शान-शौकत और रोब-दाब में रहना पसंद है। उसने कपड़े, जूते, साईकिल आदि की साफ-सफाई का भार बहादुर पर डाल दिया था। इतना काम नित्य दिन करवाने के बाद रात को सोते समय तेल से अपने शरीर का मालिश भी करवाते थे। दैनिक स्तर पर इन कार्यों को करने के कारण कभी – कभी कोई त्रुटी भी हो जाती थी। जब उसके काम में कोई कमी रह जाती थी तो उस दिन बहादुर के साथ वह गाली-गलौज के साथ-साथ मारपीट करने में जरा देर नहीं लगाते थे।
                           हालांकि उसके घर आए रिश्तेदारों के प्रपंच के परिणाम स्वरूप जब बहादुर ने उसका घर छोड़ दिया तब उसे भी अपनी गलती का आभास होता है। उसने बहादुर को ढुंढने के लिए शहर भर छान मारा। अंत में थक-हारकर अपनी मां के पास अपना पश्चाताप प्रकट करता है।
                               प्रस्तुत पात्र के माध्यम से लेखक ने कालेज स्तर के पठन-पाठन के साथ – साथ सामान्य नौकरीपेशा (जिस व्यक्ति का जीवन – निर्वहन नौकरी के आय से होता है, उसे नौकरीपेशा कहा जाता है) के घर में बच्चों के परवरिश पर प्रश्नचिन्ह खड़ा किया है। लेखक के अनुसार कालेज स्तर के बच्चों में इतना व्यवहारिक ज्ञान तो अवश्य होना चाहिए कि वह किसी की छोटी – मोटी भूल का सुधार सम्मानजनक ढंग से कर सकें। यहां मध्यमवर्गीय माता – पिता का पालन-पोषण संबंधित दोष भी सुस्पष्टता पूर्वक दिखाई देता है। किशोर ने कई बार निर्मला के सामने ही बहादुर के साथ मारपीट और गाली-गलौज की परन्तु उसने उसे ऐसा करने से कभी नहीं रोका। यहां तक कि लेखक के द्वारा भी इस दिशा में कोई पहल नहीं की जाती है। जबकि वह सबकुछ जानते है फिर भी इसे नौकरों की नियति मानते हुए किशोर को समझाने-बुझाने अथवा दंडित करने की बजाय बहादुर को ही डांट दिया करते थे। इस प्रकार किशोर में व्याप्त बुराईयों के लिए शिक्षा – व्यवस्था के साथ – साथ माता-पिता का अदूरदर्शी पालन-पोषण भी समान रूप से जिम्मेदार है।

निर्मला का चरित्र – चित्रण करें।

उत्तर – निर्मला अमरकांत जी द्वारा विरचित ‘बहादुर’ शीर्षक कहानी में कथावाचक की पत्नी के रूप में चित्रित है। कहानी में उसकी उपस्थिति एक मध्यमवर्गीय गृहणी के रूप में हुई है। कहानी के आरम्भिक अवस्था से अंतिम अवस्था तक उसकी उपस्थिति निरंतर बनी रहती है। प्रस्तुत कहानी में बहादुर के बाद जिस पात्र को सर्वाधिक प्रधानता मिली है वह निर्मला ही है। हालांकि यह एक गौण पात्र है। गौण पात्र सामान्यतः ऐसे पात्रों के लिए प्रयुक्त होते हैं जो कहानी या नाटक आदि को आगे बढ़ाने में सहायक सिद्ध होते हैं।
                     सामान्य नौकरीपेशा की पत्नी की तरह निर्मला को भी एक नौकर की लालसा है। प्रस्तुत कहानी का कथानक निर्मला की इसी अभिरुचि पर आधारित है। सामान्य भारतीय नारियों में दूसरों की देखा-देखी करने की जो प्रवृत्तियां पाई जाती हैं उससे निर्मला भी अधिक अलग नहीं है। जब उसने अपनी ननद ( पति की बहन) की शादी में अपनी जेठानियों को नौकर-चाकर के कारण सुखी पूर्वक समय व्यतीत करते हुए देखा तब उसने भी एक नौकर रखने की हठ करने लगी। उनकी इस हठधर्मिता को त्रिया हठ में बदलते देखकर लेखक ने बहादुर के रूप में एक नौकर रख लिया। नौकर मिलने से निर्मला स्वयं को औरों से ऊंची समझने लगी। ‘उसके पास नौकर है।’ यह जताने का कोई अवसर वह अपने हाथों से नहीं जाने देती थी। मध्यमवर्गीय परिवार में नौकर-चाकर को काम-धाम के साथ अपने मान-सम्मान, प्रतिष्ठा, सम्पन्नता आदि से जोड़कर देखने की परंपरा रही है। लेखक की पत्नी निर्मला के द्वारा भी इस परंपरा का पालन ईमानदारी से किया जाता है। वह बहादुर के खान-पान, कपड़े, तनख्वाह आदि की बातें हमेशा अपने पड़ोसियों को सुनाते हुए करतीं हैं।
              सामान्य नारियों की तरह दूसरों की बातों में वह भी आसानी से आ जाती है। उसने बहादुर के लिए खाना बनाना दूसरों के बहकावे में आकर ही छोड़ी थी। एक मां के रूप में भी उसके द्वारा अपने बड़े बेटे किशोर को अच्छा संस्कार नहीं दिया जाता है। हालांकि एक सामान्य भारतीय नारी की भावुकता, कृतज्ञता आदि उनमें मौजूद है। इसका प्रमाण हमें बहादुर के चले जाने पर मिलता है जब वह बहादुर के बिना कुछ लिए चले जाने पर पश्चाताप के आंसू बहाती है। अपने प्रति उसके उपकार को स्मरण करते हुए उसको श्रेष्ठ सेवक की उपाधि प्रदान करती है। अपनी गलतियों को स्वीकार करना और पश्चाताप करना मानव का स्वाभाविक गुण है। कहानी के अंतिम चरण में जिस पात्र के कारण पाठक भावुक होते हैं, वह पात्र निर्मला ही है। कुल मिलाकर देखा जाए तो निर्मला दूसरों की बातों में आकर बहक अवश्य जाती है परन्तु उनमें छल-प्रपंच, ईर्ष्या-द्वेष आदि अवगुण नहीं है।

कथावाचक का चरित्र चित्रण करें।

उत्तर – बहादुर शीर्षक कहानी का ‘कथावाचक’ स्वयं लेखक ही है। यह पात्र कहानी के अन्य पात्रों के संबंध में अपनी बातें रखते हैं तो ऐसी स्थिति में इसके व्यक्तित्व को समझना अत्यंत आवश्यक हो जाता है। कथावाचक एक सामान्य मध्यमवर्गीय नौकरीपेशा है। उसके परिवार में पत्नी निर्मला, बड़ा बेटा किशोर और एक बेटी का उल्लेख हुआ है। जब हम कथावाचक के कथनी और करनी दोनों का सूक्ष्म दृष्टि से अध्ययन करते हैं तो उसमें व्यापक अंतर्विरोध देखने को मिलता है। यदि इसे सामान्य शब्दों में कहा जाय तो कथावाचक का दोहरा चरित्र उभर कर हमारे सामने आता है। मध्यमवर्गीय परिवार में इस तरह का दोहरा चरित्र सामान्य बात है।
                                कथावाचक ने कहानी के आरम्भिक अवस्था में यह बताने का प्रयास किया है कि नौकर रखना बड़ी बात नहीं है बल्कि स्वामी धर्म का पालन करना बड़ी बात है। उसके घर में नौकर-चाकर को प्यार और सम्मान से रखने की परम्परा है। खान-पान से लेकर कपड़ा-वस्त्र तक में अंतर नहीं किया जाता है। उसके (बहादुर के) यहां रह जाने से वे कार्य – कुशल होने के साथ – साथ घर के अन्य लड़कों की तरह पढ़-लिख जाएंगे और उसका जीवन सुधर जाएगा। लेकिन कहानी की समाप्ति तक कथावाचक के द्वारा बहादुर की भलाई के लिए कुछ नहीं किया जाता है। बहादुर के साथ कभी कोई न तो प्यार से पेश आता है और न ही खान-पान में समानता दिखती है। जहां तक कपड़े की बात है तो निर्मला अपने पड़ोसियों को नित्य नए कपड़े की बात सुनाती अवश्य है परन्तु सच्चाई यह है कि उसके बिस्तर के लिए एक फटी-पुरानी दरी मिली हुई थी। उसकी शिक्षा – दीक्षा की पहल बिल्कुल नहीं की जाती है।
                                 कथावाचक ने बहादुर के होने वाले जोर-जबरदस्ती को उसकी नियति मानकर उसे रोकने के लिए कभी प्रभावी पहल नहीं किया। कहानी के एक प्रसंग में उसके दूसरे के बच्चों को साधारण श्रेणी के शरारत पर डांट – डपट देने की बात स्वीकार की जाती है। परन्तु अपने बेटे के गाली-गलौज, मारपीट जैसे असह्य दुर्व्यवहार पर मौन रह जाते हैं। इस तरह कथावाचक का दोहरा चरित्र उजागर होता है।
                  एक पिता या गृहस्वामी के रुप में उसकी स्पष्ट असफलता भी उसके व्यक्तित्व से जुड़ा हुआ है। एक पिता के रूप में बच्चों के उत्तम संस्कार के प्रति उसकी चिंता बहुत कम अवसर पर प्रकट हुए हैं। उसका बड़ा लड़का किशोर बहादुर के साथ छोटी-छोटी बातों को लेकर गाली-गलौज, मारपीट करते हैं। सबकुछ जानने के बाद भी वे किशोर को समझाने-बुझाने की बजाय बहादुर पर ही अपनी नाराज़गी प्रकट करते हैं। गृहस्वामी के रुप में भी वह अपरिपक्व नजर आते हैं। अपनी पत्नी निर्मला को आस-पड़ोस के लोगों को चिढ़ाने से रोकते हुए नहीं दिखते हैं। घर आए रिश्तेदारों की बातों में आकर बहादुर जैसे कर्मठ और निर्दोष नौकर पर हाथ उठा देता है। जबकि ऐसी स्थिति में वे समझदारी से काम ले सकते थे।
                          यदि कुल मिलाकर देखा जाए तो उसके व्यक्तित्व का दूसरा जो सबसे सराहनीय पक्ष है वह अपने तथा अपने परिवार के सदस्यों के अवगुणों को पाठकों के समक्ष निष्पक्षता पूर्वक रखना है। उसने कथा वाचन के दौरान सबों के व्यवहार को यथावत रखा। बहादुर के चले जाने पर उसकी पछतावा उसके स्वामी धर्म की असफलता की स्वीकारोक्ति है।

प्रश्न संख्या – 15

निर्मला को बहादुर के चले जाने पर किस बात का अफसोस हुआ ?

उत्तर – निर्मला एक भावुक और कृतज्ञता कुशल गृहिणी है। बहादुर के चले जाने पर उसे इस बात का अफसोस हुआ कि इतने दिनों तक सबों की सेवा करने के बाद वह बिना कुछ लिए चला गया। अब उसके जैसा कर्मठ, निष्ठावान और निश्छल नौकर कभी नहीं मिलेगा।

प्रश्न संख्या – 16

कहानी छोटा मुंह बड़ी बात कहती है। इस दृष्टि से ‘बहादुर’ कहानी पर विचार करें।

उत्तर – कहानी छोटा मुंह बड़ी बात कहती है। यह कथन (संभवतः डॉ. नामवर सिंह का कथन) कहानी के आकार के संदर्भ में कही गई है। ‘छोटा मुंह बड़ी बात’ एक प्रचलित लोकोक्ति है जिसका अर्थ “आयु या आकार में छोटा होकर भी बड़ी बातें करना।” होता है। ‘कहानी’ उपन्यास अथवा प्रबन्धकाव्य की अपेक्षा साहित्य की लघु विधा है परन्तु व्यावहारिक जीवन पर इसका व्यापक प्रभाव पड़ता है।
                                  इस दृष्टि से ‘बहादुर’ कहानी एक मध्यमवर्गीय परिवार का रहन-सहन, चाल-चलन, आचार-विचार आदि के साथ – साथ उसकी इच्छाओं, आकांक्षाओं, भावनाओं आदि का प्रतिनिधित्व करने में सफल रही है।

प्रश्न संख्या – 17

कहानी के शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए। लेखक ने इसका शीर्षक ‘नौकर’ क्यों नहीं रखा?

उत्तर – किसी भी साहित्यिक रचना के शीर्षक के संबंध में शास्त्रीय विधान है कि उसके शीर्षक में सम्पूर्ण रचना का केन्द्रीय भाव झलकना चाहिए। इसके अतिरिक्त ‘शीर्षक’ संक्षिप्त, सारगर्भित, आकर्षक, रहस्यमय आदि गुणों से युक्त भी होना चाहिए।
                             इस दृष्टिकोण से प्रस्तुत रचना के लिए ‘बहादुर’ शीर्षक सार्थकता की सभी कसौटियों पर शत-प्रतिशत खरा है। लेखक ने इसका शीर्षक ‘नौकर’ नहीं रखा क्योंकि ‘नौकर’ शीर्षक रखने से कहानी का उद्देश्य पूरा नहीं होता। बहादुर के स्थान पर यदि ‘नौकर’ शीर्षक रखा गया होता तो भी पाठकों के हृदय में ‘बहादुर’ को ही प्राथमिकता मिलती।

प्रश्न संख्या – 18

बहादुर कहानी का सारांश प्रस्तुत करें।

उत्तर – ‘बहादुर’ शीर्षक कहानी के कहानीकार हिंदी साहित्य में सशक्त कथाकार की उपाधि से विभूषित अमरकांत जी है। उक्त कहानी के वाचन का कार्य स्वयं लेखक के द्वारा किया गया है। लेखक के अनुसार उसकी पत्नी निर्मला उससे एक नौकर रखने की हठ करती है। एक दिन उसके साले साहब ने ‘दिलबहादुर’ नामक बारह – तेरह वर्ष के एक नेपाली लड़का को लेकर आए। उसका घर बिहार और नेपाल के सीमावर्ती क्षेत्र में था। उसके पिता की मृत्यु एक युद्ध में हो गई थी, इसलिए उसके घर-परिवार का भरण-पोषण उसकी मां करती थी। उसके भविष्य को लेकर चिंतित मां चाहती थी कि वह घर के कामों में सहयोग करें परन्तु वे प्रायः जंगलों, पहाड़ों आदि में भटकते रहते थे। उसके इस अल्हड़ता के कारण उसकी मां उससे क्रोधित रहती थी। एक दिन भैंस चराने के दौरान उसने उस भैंस की जबरदस्त पिटाई कर दी जिससे उसकी मां बहुत प्यार करती थी। अपनी प्यारी भैंस की पिटाई से क्रोधित मां ने बहादुर की भैंस की दोगुनी पिटाई कर दी और खेत में कराहता हुआ छोड़कर घर चली गई। मां के इस व्यवहार से उसका मन अपनी मां से उचट गया और उसी रात उसने घर से कुछ पैसे चुराकर घर छोड़ दिया।
                                    लेखक गंभीरता पूर्वक उसका अवलोकन करने के बाद कुछ दिशा-निर्देश देकर उसे अपने घर रख लेता है। निर्मला उसे केवल अपने घर का काम करने की सीख देते हुए उसके नाम से ‘दिल’ शब्द उड़ा देती है। बहादुर का शारीरिक गठन आस-पास के बच्चों के लिए कौतूहल का विषय बना हुआ था। निर्मला अपने पड़ोसियों को परोक्षरूप से ताने देती हुई उसको खाने-पीने के लिए बुलाया करती थी। धीरे-धीरे बहादुर ने घर के सारे काम करना शुरू कर दिया। सुबह उठकर घर की साफ-सफाई करना, चूल्हा-चौका करना, चाय बनाना, बर्तन मलना, कपड़ा धोना आदि के साथ – साथ निर्मला के लिए समय पर दवाई पहुंचाने जैसे सभी काम उसके द्वारा किए जाते थे। वह निर्मला से अपने घर के लिए पगार भेजने के लिए भी कहा करते थे।उसका मानना था कि माता-पिता का कर्ज जन्मभर भरा जाता है। रात को काम-धाम के बाद जब वह अपने बिस्तर पर जाता था तो नेपाली टोपी पहनकर गोलियों, ताश की गड्डी, पत्थर के टुकड़ों, ब्लेड, कागज की नावों आदि से खेलने के बाद धीमे स्वरों में जब पहाड़ी गानों गुनगुनाने लगते थे तो लेखक को ऐसा महसूस होता था कि मानो पहाड़ की निर्जनता में कोई अपने बिछड़े हुए साथी को पुकार रहा हो।
                                          धीरे-धीरे समय बीतने लगा लेखक में भी सामान्य मध्यमवर्गीय नौकरीपेशा की भांति आडम्बर का आगमन हो चुका था। दूसरों के साधारण गलतियों पर भी उपदेश देने लगते थे। जहां – तहां नौकर का धौंस जमाने लगते थे। वैसे बहादुर के कारण घर, चूल्हा, कपड़ा, बर्तन, जूता आदि पहले की अपेक्षा अधिक साफ-सुथरा रहने लगा था। घर में सबको बहुत आराम मिलने लगा था। सभी छोटे-छोटे कामों के लिए बहादुर को ही पुकारते थे। सभी रात में सबेरे सो जाया करते थे और सुबह देर से उठते थे। लेखक का बड़ा लड़का किशोर ने धीरे-धीरे अपने कपड़े, जूते, साईकिल आदि की साफ-सफाई से लेकर रख-रखाव तक का काम बहादुर को सौंप दिया। इन सब कामों के अतिरिक्त वह नित्य रात में बहादुर से अपने शरीर की मालिश करवाने के साथ – साथ मुक्की भी लगवाता था। उसके इन कामों में जब कभी कोई कमी रह जाती थी तो वह गर्जन-तर्जन करते हुए बहादुर के साथ गाली-गलौज और मारपीट करने लगता था। एक दिन बहादुर किशोर की साइकिल साफ करना भूल गया। इस भूल के लिए उसके द्वारा बहादुर को डंडे से पिटाई करते हुए उसे ‘सूअर का बच्चा’ कह दिया। यह गाली बहादुर के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचा दी। इस गाली के बाद उसने किशोर का काम करने मना कर दिया। हालांकि लेखक के समझाने पर वह फिर से उसका काम करने लगा। कुछ समय के पश्चात एक दिन निर्मला ने मोहल्ले की किसी औरत की बहकावे में आकर बहादुर के लिए रोटियां सेंकना बंद कर दी और उसे अपने लिए रोटियां सेंक लेने के लिए कह दी। बहादुर ने ऐसा करने से मना कर दिया। इस पर क्रोधित होकर निर्मला ने बहादुर पर दो – तीन थप्पड़ जड़ दी। परन्तु बहादुर पर उस मार का भी कोई असर नहीं हुआ। लेखक ने भी बहादुर को समझाने का प्रयास किया लेकिन परिणाम शून्य रहा। वह बिना भोजन किए भूखे सो गया, हालांकि सुबह उठकर हंसते हुए अपने लिए रोटियां सेंकने लगा। फिर रात की सब्जी के साथ वह मोटी और भद्दी रोटियां खाकर काम करने लगा। पहले की अपेक्षा अब उससे भूल और गलतियां अधिक होने लगी थी। 
                    एक दिन रविवार को निर्मला के कोई रिश्तेदार अपने पत्नी और बच्चों के साथ आए। लेखक के द्वारा अतिथियों के लिए बाजार से रोहू मछली और देहरादूनी चावल लाया गया। नाश्ता – पानी के बाद सभी आपस में बातचीत में रम गए। इस दौरान रिश्तेदार की पत्नी ने असहज अवस्था में इधर – उधर कुछ खोजबीन करने लगी। लेखक द्वारा पूछे जाने पर वह बताती है कि बच्चों के संदेश के लिए साड़ी की खूंट से ग्यारह रुपए निकालकर इस चारपाई पर रखा था परन्तु वह नहीं मिल रहा है। फिर बहादुर की ओर संकेत करती हुई बोली कि जरा उससे पूछिए न ! वह यहां आया था और कुछ देर रुकने के बाद यहां से तेजी से बाहर निकला था। पहले तो लेखक के द्वारा इस पर आपत्ति जताई जाती है परन्तु रिश्तेदार के द्वारा उकसाए जाने पर वे बहादुर को बुलाकर पूछताछ करने लगते हैं। पूछताछ के दौरान बहादुर ने दृढ़ता पूर्वक बताया कि उसने पैसे नहीं चुराए है। फिर अचानक से लेखक को न जाने क्या हुआ कि उसने बहादुर की पिटाई शुरू कर दी। लेखक के हाथों मार खाकर रो रहे बहादुर को रिश्तेदार के द्वारा बार-बार पुलिस की धमकी के साथ पारितोषिक (इनाम) का प्रलोभन भी दिया जाता है। परन्तु बहादुर पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। निर्मला के द्वारा भी उसके साथ मारपीट करते हुए पूछताछ की जाती है। इस मानसिक दुर्घटना के बाद वह काफी उदास रहने लगा था। उसका उदार हृदय आहत हो चुका था।
                इस अमर्यादित आचरण से आहत बहादुर ने एक दिन सबको पश्चाताप के प्रदीप्त पीड़ा में डालकर लेखक का घर छोड़ दिया। वह अपने आपको निर्दोष सिद्ध करने के लिए अपने पगार के साथ-साथ कपड़े, जूते आदि सबकुछ वहीं छोड़ दिया। बहादुर निर्धन अवश्य था परन्तु आत्मा से बड़ा धनवान था। वह आयु से अवश्य अपरिपक्व था परन्तु कर्तव्य बोध की दृष्टि से बड़ा परिपक्व था।

बहादुर पाठ में प्रयुक्त संयुक्त शब्द और उसका संधि – विच्छेद :-

वातावरण = वात + आवरण

निर्मल = नि: + मल

निर्जन = नि: + जन

निस्संदेह = नि: + संदेश

व्यवहार= वि + अवहार

बहादुर कहानी का कठिन शब्द और उनके अर्थ :-

           अथवा

बहादुर कहानी का शब्दार्थ लिखें।

सहसा —- अचानक, एकाएक।

गंभीर —- गहरा, चिंतामग्न ।

भारी — वजनदार, बड़ा, विशाल।

दायित्व —– जवाबदेही, जिम्मेदारी, कार्यभार।

ठिगना —- छोटे कद वाला।

चकइठ —- गोल-मटोल।

चपटा मुंह — छोटा / पिचका नाक वाला मुंह।

नेकर —– पैंट। (जैसे:- फूल पैंट या हाफ पैंट)

सफेद — उजला। (विलोम – श्याम/काला)

कमीज —- शर्ट, (मैथिली – अंगा)

भूरा —- मटमैला, खाकी।

दृष्टि — नजर।

निश्चय —- निश्चित रूप से।

साला —- पत्नी या साली का भाई। (विलोम – साली)

शाला —- घर, आलय, आवास।

ओहदा —- पद।

शादी — विवाह।

खटना —- जीतोड़ मेहनत करना।

ईर्ष्या —- जलन।

जून —- समय।

अभागिन — भाग्यहीन। (विलोम – भाग्यवान)

दुखिया — दु:खी, संकटग्रस्त।

दुनिया — संसार, सृष्टि।

असाधारण —– साधारण से श्रेष्ठ। (विलोम – साधारण)

विस्तार — फैलाव, लंबा-चौड़ा। (विलोम – संक्षेप)

बाप — पिता ( विलोम : बाप – मां , पिता – माता)

गुस्सैल —- क्रोधी स्वभाव।

चिढ़ना —- बुरा मानना, खिन्न रहना।

बेचारा —- दीन-हीन, गरीब, निस्सहाय।

बेजुबान —– आवाज विहीन, बोलने में असमर्थ।

लौंडा —- नासमझ बालक, छिछोरा नवयुवक, उदंड बेटा। ( विलोम – लौंडी)

काल्पनिक —- अनुमानित, कल्पित।

अनुमान — अंदाजा, अटकल।

मील —- 5280 फुट या 1760 गज।

स्वर — आवाज।

झनझनाहट —— झुनझुनी, झंकार।

हिदायत —— निर्देश, मार्गदर्शन, चेतवानी।

शरारत —– अशिष्टता, लड़कपन, चंचलता।

इज्जत —— आदर, सम्मान।

ढंग – शऊर —- काम-धाम का सही तरीका/योग्यता।

शऊर —- सलीका, शिष्टाचार।

तुच्छ —- नीच।

तमीज —– शिष्टाचार, सभ्यता पूर्वक।

उदारतापूर्वक —– दयालुता पूर्वक।

हंसमुख —– प्रसन्नचित्त, हास्य प्रिय, हमेशा हंसने वाला।

उत्साह —– उमंग।

वातावरण —- माहौल, परिवेश।

फरमाइश —– आग्रह, अनुरोध, मांग।

फिक्र —— ध्यान, चिंता

महीनवारी —– प्रतिमाह, मासिक।

नाश्ता —- कलेवा, जलपान, अल्पाहार।

खर्च —- व्यय, खपत।

तकलीफ़ —– दु:ख, दिक्कत।

पुलई —  टहनी अथवा शाखा का अंतिम सिरा।

अंगीठी —- कोयले की चूल्हा।

तबियत —- स्वास्थ्य।

दवा —– औषधि।

दफ्तर —- कार्यालय।

मामूली —– साधारण, सामान्य।

रिपोर्ट —- सूचना।

सहेली —- सखी, दोस्त।

गोया — मानो, जैसे।

मजेदार —- मनोरंजक, आनन्ददायक।

कर्जा —– ऋण।

बरामदा —- ओसरा, छज्जा।

आईना —- दर्पण।

ब्लेड —- पत्ती ।

नोट:- ब्लेड का आविष्कार किंग केंप जिलेट के द्वारा किया गया था। उसने 1901 ई. में विलयम निकर्सन के साथ मिलकर ब्लेड का आविष्कार किया था।

निर्जनता —– शून्यता, सुनसान, सूनापन।

बड़प्पन —- बड़ा/श्रेष्ठ होने का भाव, श्रेष्ठता।

सदा —- हमेशा, शाश्वत।

सवांग —– सगा, परिवार का सदस्य।

शुभ —- सुखद, कल्याणप्रद।

तनख्वाह —- वेतन, मासिक पगार।

जरूर —– अवश्य, निश्चित।

निस्संदेह —- बेशक, सचमुच, निश्चित रूप से।

पेन्सिल —- लकड़ी में ग्रेफाइट की पतले छड़ से निर्मित लेखनी।

नोट:– पेन्सिल का आविष्कार फ्रांसिसी वैज्ञानिक सह कलाकार निकोलस जैक्स कान्टे के द्वारा 1795 ई. में किया गया था। कान्टे के संबंध में बताया जाता है कि उसने नेपोलियन बोनापार्ट की सेना में भी अपनी सेवाएं प्रदान की थी। पेन्सिल शब्द की उत्पत्ति लैटिन शब्द ‘पेनिकुलस’ से हुई है जिसका अर्थ ‘छोटी पूंछ’ होता है।

फिरकी —— एक प्रकार का घिरनी या घुमावदार खिलौना।

नोट :- ‘फिरकी’ शब्द से मोहम्मद रफी साहब का एक गीत “ओ फिरकी वाली तु कल फिर आना” बहुत प्रसिद्ध है

काफी — बहुत।

शान-शौकत — ठाठ – बाट।

रोब-दाब —- दबदबा, धाक।

कायल —- प्रशंसक, अनुयायी, आदी, अभ्यस्त।

कड़े —- कठोर।

अनुशासन —– शासन के अधीन।

फलत: — परिणामस्वरूप, परिणामत:।

सौंप देना —– भरोसे छोड़ देना, निपटने की जिम्मेदारी देना।

कालेज —- महाविद्यालय।

साइकिल —- द्विचक्रवाहिनी, पैर गाड़ी, हथघोड़ा।

इस्त्री या इस्तरी —- विशेष आकृति के गर्म लोहे के द्वारा कपड़े को चिकना बनाने अथवा प्रेस करने की प्रक्रिया को इस्त्री या इस्तरी कहते हैं।

नित्य — निरंतर, प्रतिदिन।

मालिश —– शरीर पर तेल लगाकर कर हस्तमर्दन करना।

गड़बड़ी —– चूक, अव्यवस्था, अनियमितता।

कामचोर —– काम से भागने वाला, आलसी, निकम्मा।

हुलिया —– शक्ल-सूरत, मुखाकृति।

अलग —- दूर, लग नहीं।

vidyapur.in पर प्रत्येक पाठ का प्रश्नोत्तर मौजूद है।

भद्दी —– गंदी।

बरदाश्त —– सहन।

खैर —– जो हो, अस्तु, चाहे जो भी हो।

गृहस्वामी —– घर का मालिक, गृहपति, गृह प्रमुख।

आदत —– स्वभाव, लत।

कोशिश —– प्रयास।

मेहनत —– परिश्रम।

नापसंद —- अप्रिय।

महीन —– कोमल, बारीक, पतला।

चौका —– पाकशाला, भोजनालय, रसोईघर।

तीता —- तीखा, बुरा।

चुपचाप —- मुंह बंद कर।

लपकना —- सहसा तेजी से बढ़ना।

स्वच्छ —- साफ-सुथरा।

चिट्ठी —- पत्र।

शायद —- संभवतः।

रोहू मछली —- इस मछली में विटामिन सी अधिक और वसा कम पायी जाती है। यह अन्य मछलियों की अपेक्षा अधिक स्वादिष्ट होती है। इसलिए बाजार में इसकी मांग सबसे अधिक होती है। इसका वैज्ञानिक नाम लेबियो रोहिता (Labeo Rohita) है

फर्श —- कंकड़-पत्थर से तैयार धरातल या जमीन।

जलेबी — यह भारतीय उपमहाद्वीप का एक प्रसिद्ध व्यंजन है। इसका स्वाद मीठा होता है। इसको अंग्रेजी में फनल केक (Funnel Cake), स्वीटमीट (Sweetmeat) या राउंडेड स्वीट (Rounded sweet) कहा जाता है। यह भारत का राष्ट्रीय मिठाई है। बंगाल में इसे जिलपी कहा जाता है। जबकि संस्कृत भाषा में इसे कुण्डलिनी कहा जाता है।

मजबूरी —- विवशता।

खूंट —- साड़ी या धोती का कोना।

आने —- एक रुपया में 16 आने माने जाते हैं। अभी के समय में एक आना 6.25 पैसे के बराबर होता है।

प्रफुल्लता —– आनन्द, आनन्द का भाव।

न मालूम —– पता नहीं।

निर्भय —– निडर, भयमुक्त।

अजीब —- विचित्र।

हरकत —– शरारत, चेष्टा।

घाघ —- चतुर, धूर्त।

नुकसान — हानि।

तमाचा —– थप्पड़।

दुरदुराना —— तिरस्कार करना, अपमानित करना।

लापरवाही —– असावधानी, आलस्य।

विलंब —— देर।

सिलबट्टा — पत्थर के जिस टुकड़े का प्रयोग मसाला आदि पीसने के लिए किया जाता है।

किस्मत —- भाग्य।

आराम —- विश्राम।

प्रपंच —- छल-कपट।

गुम होना — खो जाना।

माफी —- क्षमा।

आंचल —- पल्लू।

लघुता —- छोटापन, तुच्छ पन।

स्टूल —- तीन या चार पैर वाला मचिया।

अलगनी —- वस्त्र या कपड़ा टांगने के लिए बांधी गई रस्सी।

यूं डू नॉट नो दीज पीपुल आर एक्सपर्ट इन दिस आर्ट का अर्थ या मतलब क्या होता है?

You do not know these people are expert in this art का अर्थ बताओं।

– यू डू नॉट नो दीज पीपुल आर एक्सपर्ट इन दिस आर्ट का अर्थ होता है- ‘आप नहीं जानते हैं ये लोग इस कला में निपुण होते हैं।”

बहादुर कहानी में प्रयुक्त मुहावरे अथवा लोकोक्तियों का अर्थ एवं प्रयोग:-

आंखें मटकाना — आंखों से संकेत करना। आंखों की पुतलियों को घुमाना।

प्रयोग:- राम अपनी आंखें मटकाकर मुझे बुलाना चाहता था।

आंखों को मलकाना — आंखों को खोलना और बंद करना। आश्चर्यचकित ढंग से देखना।

प्रयोग:- अनजान लोगों से घिरा बहादुर अपनी आंखों को बुरी तरह मलका रहा था।

चमकती दृष्टि से देखना —- आशापूर्ण दृष्टि से देखना।

प्रयोग :- अतिथि के आगमन पर संदेश आदि के लिए बच्चे प्रायः चमकती दृष्टि से इधर उधर देखते हैं।

चारपाइयां तोड़ना — आराम/विश्राम करना।

प्रयोग :- जब से मोहनलाल के घर नौकर आया है वह राजा की तरह चारपाइयां तोड़ता है।

ईर्ष्या से जलना —- दूसरों के सुख को नहीं सह पाना।

प्रयोग:- जब विराट की सफलता को देखकर नागपाल ईर्ष्या से जलने लगा।

माला जपना — बार-बार स्मरण करना।

प्रयोग :- चुनाव के समीप आते ही नेता लोग अपने – पराए की माला जपना शुरू कर देते हैं।

हाथ बंटाना —- सहयोग करना।

प्रयोग:- नरेंद्र मोदी चाय की दुकान पर अपने पिता का हाथ बंटाते थे।

माथा ठनकना —- किसी अनिष्ट/अशुभ की आशंका होना।

प्रयोग:- विराट कोहली को दूर से लंगड़ाते देखकर कप्तान का माथा ठनक गया।

गुस्सा से पागल होना —- क्रोध के कारण अपना आत्मनियंत्रण खो देना।

प्रयोग :- चुनाव में अपने नेता को हारते देख कई बार उसके चमचे जनता पर गुस्सा से पागल हो जाते हैं।

मन फट जाना —- हृदय से निकल जाना, मन में विरक्ति आ जाना।

प्रयोग:- मुखिया जी के दुर्व्यवहार के कारण उनके चमचों का मन फटते रहता है।

नौ – दो ग्यारह होना —- भाग जाना।

प्रयोग :- लोन वाले को देखकर कई लोग नौ दो ग्यारह हो जाते हैं।

खिसक जाना —- दूर हट जाना या नजर बचाकर निकल जाना।

प्रयोग:- नयनसुख को पान की दुकान पर आता देखकर उसके पिता कर्णसुख वहां से खिसक गए।

जलाना – भुनना — छोटी-छोटी चीजों के लिए तरसाना।

प्रयोग:- कंजूस व्यक्ति अपने बाल-बच्चों को जलाते-भुनते है।

साफ-साफ कहना —- स्पष्ट रुप से कहना।

प्रयोग:- दुकानदार ने साफ-साफ कह दिया कि अब उधार का समान नहीं मिलेगा।

छाती पिटना — मातम मनाना।

प्रयोग:- चुनाव में अपने नेता को हारते देखकर अकड़ में जीने वाले समर्थक छाती पिटने लगते हैं।

दिन मजे में बीतना —- आराम से समय गुजरना।

प्रयोग:- चुनाव जीतने के साथ ही अधिकांश नेताओं के दिन मजे में बीतने लगते हैं।

सीधे मुंह बात नहीं करना —– बातों को घमंड पूर्वक घुमाफिरा कर कहना।

प्रयोग:- धनवान व्यक्ति या जीते हुए नेता निर्धनों से प्रायः सीधे मुंह बात नहीं करते हैं।

खर न टसकाना —- कोई काम नहीं करना।

प्रयोग:- मुर्खों को धन की प्राप्ति होने पर वे खर टसकाना भी नहीं चाहते हैं।

मामूली से मामूली —- साधारण से साधारण, छोटी से छोटी।

प्रयोग:- जब से मुखिया जी की शादी टूटी है तब से वह मामूली से मामूली बात पर भड़क उठते हैं।

फिरकी की तरह नाचना —- अत्यधिक व्यस्त और सक्रिय रहना।

प्रयोग:- चुनाव आते ही पूरे पांच वर्ष के लिए जनता से दूर रहने वाले नेताजी उसके बीच आकर फिरकी की तरह नाचने लगता है।

शान-शौकत में रहना —- ठाठ – बाट में रहना।

प्रयोग:– बड़े घर के बच्चे प्रायः शान-शौकत में रहते हैं।

रोब – दाब में रहना —- धाक जमाकर रहना।

प्रयोग:- मंत्री तो मंत्री उसके बाल-बच्चे भी बहुत रोब-दाब में रहते हैं।

गर्जन – तर्जन करना —- जोर-जोर से बोलना, डांट – डपट करना।

प्रयोग:- हाई बीपी के रोगी छोटी-छोटी बातों पर भी गर्जन-तर्जन करने लगता है।

हुलिया टाइट करना —- शक्ल-सूरत बिगाड़ देना।

प्रयोग:- ग्रामीणों ने चोर को मार – मारकर हुलिया टाइट कर दिया।

एक हाथ से ताली नहीं बजना — किसी विवाद में दोनों पक्ष की गलती होना।

प्रयोग:- जब दो पक्षों में विवाद होता है तो कमोबेश दोनों को गलतियां होती है। ताली एक हाथ से नहीं बजती है।

बरदाश्त नहीं होना — सहन नहीं होना।

प्रयोग:- ईमानदार अधिकारियों को भ्रष्टाचार बरदाश्त नहीं होता है।

सख्त नापसंद होना —- बिल्कुल पसंद नहीं होना।

प्रयोग:- मधुमेह के कारण मनहूस मंसूरी को मिठाई सख्त नापसंद है।

आदत बिगड़ जाना — गलत आदत लगना।

प्रयोग:- बच्चों को आरम्भिक अवस्था में अनुशासित नहीं रखने से उनकी आदतें बिगड़ जाती है।

जंच जाना — सही ठहराना, पसंद आना।

प्रयोग:- शराबियों को संतों की बातें नहीं जंचती हैं।

मुंह उतर जाना —- उदास हो जाना, दुखी होना।

प्रयोग:- परीक्षा में बेटा के अपेक्षित परिणाम नहीं देखकर माता – पिता के मुंह प्रायः उतर जाते हैं।

तीता लगना — बुरा लगना, अप्रिय लगना।

प्रयोग:- बच्चों को पढ़ाई-लिखाई की बात प्रायः तीता लगता है।

मारते – मारते मुंह रंग देना —- बहुत मारना, मार – मार कर सुधार लाना।

प्रयोग:- पुलिस ने चोर को मारते-मारते मुंह रंग दिया।

बातों की जलेबी छानना —- बातचीत का आनंद लेना, बातों को गोल-गोल घुमाना।

प्रयोग:- बिजेंद्र बेताल बातों की जलेबी छानने में निपुण है।

जांच पड़ताल करना — विस्तृत खोजबीन करना।

प्रयोग:- चोरी की शिकायत के बाद घटनास्थल पर पहुंचकर पुलिस ने जांच पड़ताल किया।

मुंह काला पड़ जाना —- बहुत शर्मिंदा होना, कलंक लग जाना।

प्रयोग:- चोरी के झूठे आरोप के कारण बहादुर का मुंह काला पड़ गया।

जान के पीछे पड़ना — हमेशा तंग करने के लिए तैयार रहना।

प्रयोग:- किशोर बहादुर के जान के पीछे पड़ गया था।

बहादुर कहानी के लेखक परिचय दें।

‘बहादुर’ शीर्षक पाठ साहित्य की कौन सी विधा है?

– कहानी

‘बहादुर’ शीर्षक कहानी के कहानीकार कौन है?

– ‘बहादुर’ शीर्षक कहानी के कहानीकार अमरकांत जी है।

अमरकांत का जन्म कब और कहां हुआ था?

– अमरकांत का जन्म उत्तर प्रदेश के बलिया जिला के नागरा गांव में 1 जूलाई 1925 ई. में हुआ था।

अमरकांत जी की कौन सी कहानी अखिल भारतीय कहानी प्रतियोगिता में पुरस्कृत हुई थी?

– अमरकांत जी की ‘डिप्टी कलेक्टरी’ नामक कहानी अखिल भारतीय कहानी प्रतियोगिता में पुरस्कृत हुई थी।

अमरकांत जी को कथा लेखन के लिए “साहित्य अकादमी पुरस्कार” कब प्रदान किया गया था?

– अमरकांत जी को कथा लेखन के लिए “साहित्य अकादमी पुरस्कार” 2007 में प्रदान किया गया था। अमरकांत जी को यह साहित्य अकादमी पुरस्कार “इन्ही हथियारों से” नामक उपन्यास के लिए प्रदान किया गया था।

अमरकांत जी के प्रमुख कहानी संग्रह कौन-कौन से हैं?

– अमरकांत जी के प्रमुख कहानी संग्रह जिंदगी और जोंक, देश के लोग, मौत का नगर, मित्र – मिलन, कुहासा आदि हैं।

अमरकांत जी द्वारा रचित प्रमुख उपन्यास कौन-कौन से हैं?

– अमरकांत जी द्वारा रचित प्रमुख उपन्यास सूखा पत्ता, आकाश पक्षी, काले उजले दिन, सुखजीवी, बीच की दीवार, ग्राम सेविका, इन्हीं हथियारों से आदि हैं।

अमरकांत ने किस बाल उपन्यास की रचना की है?

– अमरकांत ने “वानर सेना” नामक बाल उपन्यास की रचना की है।

‘बहादुर’ शीर्षक कहानी की पृष्ठभूमि और भाषा शैली का वर्णन या मूल्यांकन करें।

– ‘बहादुर’ शीर्षक कहानी की पृष्ठभूमि एक मध्यमवर्गीय परिवार में नौकर-चाकर के महत्व और उसके साथ होने वाले जोर-जबरदस्ती पर आधारित है। जहां तक कहानी की भाषा शैली की बात है तो इस दृष्टिकोण से भी कहानी में पात्र सम्मत भाषा का परिपक्व प्रयोग देखने को मिलता है। सम्पूर्ण कहानी में कहीं भी बनावटी या अनावश्यक रूप से बढ़ा – चढ़ाकर पेश की गई भाषा का प्रयोग देखने को नहीं मिलता है। हां, भाषा का प्रयोग पात्रों के योग्यता के अनुरूप अवश्य है। जैसे बहादुर के आने पर आस-पड़ोस के बच्चों का बहादुर से ऐसा पूछना कि “ऐ, तुम लोग छिपकली को क्या कहते हो?” ऐसे वाक्यों या प्रश्नों से उस आयु वर्ग का बाल मनोभाव उजागर होता है। निर्मला द्वारा अपने पड़ोसियों को सुनाते हुए बहादुर के भोजन-पानी, कपड़े, वेतन आदि की चर्चा करने की घटना मध्यमवर्गीय परिवार की गृहणियों के अंतर्मन में सामने वाली औरतों से बड़ी दिखने की दबी हुई आकांक्षा को प्रकट करती है। बहादुर का अपनी मां के बारे में ऐसा कहना कि “वह मारता क्यों था?” यह भी एक प्रकार की भाषाई निपुणता ही है। क्योंकि वह नेपाल का है इसलिए वह बिना पढ़े शुद्ध हिन्दी नहीं बोल सकता है। किशोर का ऐसा कहना कि “देख बे! मेरा काम सबसे पहले होना चाहिए। अगर एक काम छुटा तो मारते – मारते हुलिया टाइट कर दूंगा।” इस तरह की भाषा कालेज लाइफ के लड़के ही अपनी धाक जमाने के लिए बोल सकता है।

लेखक के घर आए रिश्तेदार का यह कथन ” यू डू नॉट नो दीज पीपुल आर एक्सपर्ट इन दिस आर्ट” यदि हिन्दी में रहता तो नौकर-चाकर के प्रति उसकी दुर्भावना शायद इस दंभ और अभिमान के साथ प्रकट नहीं होता। इस प्रकार भाषा शैली की दृष्टि से यह कहानी अपने उद्देश्य पर शत प्रतिशत खरा उतर रहा है।

प्रिय पाठक! आशा करता हूं कि अन्य पाठ की तरह इस पाठ के प्रश्नोत्तर भी आपको अवश्य पसंद आएंगे। आपके ऊर्जावान सुझाव की प्रतीक्षा रहेगी। ।। धन्यवाद।।

2 thoughts on “बहादुर”

  1. मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि इस पोस्ट को जो विद्यार्थी अच्छे से पढ़ ले उस विद्यार्थी को बोर्ड परीक्षा में इस पाठ से संबंधित एक भी प्रश्न ऐसा नहीं होगा जो की न बने।

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