श्रम विभाजन और जातिप्रथा

 श्रम विभाजन और जाति प्रथा पाठ का सारांश 

‘श्रम विभाजन और जाति प्रथा’ डॉ भीमराव अम्बेडकर का सुप्रसिद्ध भाषण ‘एनीहिलेशन ऑफ कास्ट’ का हिंदी में भाषांतरित ‘जाति-भेद का उच्छेद’ का संशोधित संस्करण (वर्जन) है। ‘जाति-भेद का उच्छेद’ के रूप में यह भाषांतरण ललई सिंह यादव के द्वारा किया गया। 

                                                       निबंध के रूप में संकलित इस पाठ में जातिप्रथा से संबंधित तमाम बुराईयों का व्यापक विश्लेषण किया गया है। बाबा साहेब अम्बेडकर के अनुसार जातिवाद के कोख से उत्पन्न विभाजनकारी विचारों ने देश के सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक आयामों को न सिर्फ कमजोर किया है बल्कि लोगों के लिए ऊंच-नीच और छुआछूत जैसे विषाक्त वातावरण भी तैयार कर दिया।   

                                                         प्रस्तुत पाठ ‘श्रम विभाजन और जाति प्रथा’ के अंतिम अनुच्छेद में आदर्श सामाज की विशेषताओं की विवेचना की गई है। यहां सामाजिक समानता, स्वतंत्रता और भाईचारे पर बल देते हुए एक-दूसरे के प्रति श्रद्धा और सम्मान की बातें कही गई है ताकि भारत की लोकतांत्रिक प्रणाली और अधिक सुदृढ़ तथा समृद्ध हो सके।

‘श्रम विभाजन और जाति प्रथा’ शीर्षक पाठ का उद्देश्य क्या है?

‘श्रम विभाजन और जाति प्रथा’ शीर्षक पाठ का उद्देश्य सामाजिक स्तर पर व्याप्त जाति आधारित भेदभाव को समाप्त कर समतामूलक समाज का निर्माण करना है।

‘श्रम विभाजन और जाति प्रथा’ शीर्षक पाठ के पारिभाषिक शब्द

जातिवाद क्या है?जातिवाद किसे कहते हैं? जातिवाद से आप क्या समझते हैं?

– वह मत या विचारधारा जिससे प्रभावित व्यक्ति अपनी जातीय हित को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हैं अथवा जाति के आधार भेदभाव करते हैं, उसे जातिवाद कहते हैं। जैसे – चुनावी राजनीति में अधिकांश लोग उम्मीदवारों के व्यक्तिगत क्षमता, योग्यता, कर्तव्यनिष्ठा, कर्मठता आदि के बजाय अपनी जाति से संबंधित उम्मीदवार को प्राथमिकता देते हैं भले ही वह अयोग्य क्यों न हो।

 

‘जातिवाद के पोषक’ से आप क्या समझते हैं?

– वैसे व्यक्ति जो सामाजिक, राजनैतिक या आर्थिक स्तर पर जातिवाद को बढ़ावा देते हैं या उचित मानते हैं,उसे ‘जातिवाद के पोषक’ कहते हैं। जैसे – स्वयं की जाति को ऊंचा मानने वाले लोग प्रायः अपने बच्चों को अन्य जातियों के बच्चों से दूर रहने के लिए बाध्य करते हैं। ऐसे ही लोग ‘जातिवाद के पोषक’ है।

 

कार्य-कुशलता क्या है? कार्य-कुशलता किसे कहते हैं? कार्य-कुशलता से आप क्या समझते हैं?

किसी व्यक्ति द्वारा किसी कार्य को दक्षतापूर्वक सम्पन्न करने के कौशल को उस व्यक्ति की ‘कार्य- कुशलता’ कहते हैं। जैसे – स्वर्णकारों में प्रायः आभूषण-निर्माण से संबंधित ‘कार्य – कुशलता’ पायी जाती है।

 

श्रम विभाजन क्या है? श्रम विभाजन किसे कहते हैं? श्रम विभाजन से आप क्या समझते हैं?

किसी पेशा गत कार्य को समुदाय या जाति-विशेष के लिए विभाजित करने की सामाजिक व्यवस्था को श्रम विभाजन कहते हैं। जैसे – ग्वाला जाति के लिए पशुपालन, कोईरी के लिए शाक-सब्जी का उत्पादन, ठाकुर के लिए हजामत, चर्मकार के लिए मृत पशुओं का खाल या चमड़ा उतारना आदि को जाति आधारित श्रम विभाजन है।

 

श्रमिक विभाजन क्या है? श्रमिक विभाजन से आप क्या समझते हैं? श्रमिक विभाजन किसे कहते हैं?

जाति आधारित श्रम विभाजन में कार्य के आधार पर किसी जाति के लोग को ‘ऊंच’ और किसी को ‘नीच’ के रूप में वर्गीकरण को श्रमिक विभाजन कहते हैं। जैसे – पारश्रमिक लेकर धार्मिक अनुष्ठानों का संपादन करने वाले ‘पंडित’ ऊंच श्रमिक और बिना पारश्रमिक लिये मृत पशुओं को घर से उठाकर ले जाने वाले ‘चर्मकार’ नीच श्रमिक के रूप में विभाजित है।

 

पैतृक पेशा क्या है? पैतृक पेशा किसे कहते हैं? पैतृक पेशा से आप क्या समझते हैं?

किसी व्यक्ति के द्वारा अपने जीवन-यापन के लिए अपनाए गए अपने पिता या पूर्वजों के पेशा को उस व्यक्ति का पैतृक पेशा कहते हैं। जैसे:- रामदेव के परिवार में पत्नी, एक बेटा खोखा और एक बेटी अनिता सहित कुल चार सदस्य थे। रामदेव भूंजा की दुकान करता था और उसी से अपने परिवार का भरण-पोषण करता था। इस काम में कभी-कभी उनका बेटा खोखा भी हाथ बंटा देता था। एक दिन एक सड़क दुघर्टना में रामदेव का निधन हो जाता है और अब परिवार के भरण-पोषण की जवाबदेही उसके 12 वर्षीय बेटा खोखा के ऊपर आ गई। अब अपने पिता के स्थान पर खोखा लोगों को भूंजा खिलाने लगते हैं। यहां ‘खोखा’ के द्वारा अपनाए गए पेशा “पैतृक पेशा” है।

 

बेरोजगारी क्या है? बेरोजगारी किसे कहते हैं? बेरोजगारी से आप क्या समझते हैं?

किसी कार्य विशेष में कुशल व्यक्ति को मनोनुकूल कार्य या रोजगार नहीं मिलने की दशा को बेरोजगारी कहते हैं।

 

श्रम विभाजन और जाति प्रथा पाठ का शब्दार्थ

  • शब्द————————— अर्थ
  • विडंबना ——– उपहास जनक/अपमान जनक
  • जातिवाद ——- जाति आधारित मत
  • श्रम —————— काम/कार्य
  • पोषक ————- पालने वाला/परवरिश कर्ता
  • तर्क —————- दलील
  • आपत्ति ——– असहमति / अस्वीकृति
  • पेशा ———– जीविकोपार्जन से संबंधित कार्य
  • दूषित ———– गंदा
  • अकस्मात ——- अचानक/एकाएक
  • दोष ————— बुराई/अवगुण
  • स्वेच्छा ———— अपनी इच्छा
  • वांछित ———— इच्छित
  • श्रद्धा ————– आदर
  • परिवर्तन ———- बदलाव
  • पहलू ————- पक्ष
  • अरुचि ——— इच्छा-विरुद्ध
  • भ्रातृत्व ——— भाईचारा/बंधुत्व
  • पूर्वनिर्धारण —- पहले से तय
  • प्रतिकूल ——– विपरीत/उल्टा
  • उत्पीड़न ——– पीड़ादायक शोषण
सभ्य का विलोम (विपरीतार्थक) क्या होता है?

– सभ्य का विलोम असभ्य होता है।

 

निश्चय का विलोम क्या होता है?

– निश्चय का विलोम अनिश्चय होता है।

 

ऊंच का विलोम शब्द क्या होता है?

– ऊंच का विलोम नीच होता है।

 

स्वतंत्रता का विलोम शब्द क्या होता है?

– स्वतंत्रता का विलोम परतंत्रता होता है।

 

दोष का विलोम शब्द क्या होता है?

– दोष का विलोम गुण होता है।

 

विभाजन का विलोम क्या होता है?

– विभाजन का विलोम संयोजन या संघ होता है।

 

सजग का विलोम क्या होता है?

– सजग का विलोम असजग  या असावधान होता है।

 

रक्षा का विलोम शब्द क्या होता है?

– रक्षा का विलोम विनाश होता है।

 

पूर्वनिर्धारण का विलोम शब्द क्या होता है?

– पूर्वनिर्धारण का विलोम पश्चनिर्धारण होता है।

 

दूषित का पर्यायवाची शब्द लिखे।

– दूषित का पर्यायवाची शब्द गंदा , अपवित्र आदि होता है।

 

श्रमिक पर्यायवाची शब्द लिखे ।

– श्रमिक का पर्यायवाची मजदूर , कामगार आदि होता है।

 

पेशा का पर्यायवाची शब्द लिखे।

– पेशा का पर्यायवाची जीविका , व्यवसाय , वृत्ति , कार्य आदि होता है।

 

अकस्मात का पर्यायवाची शब्द लिखे।

– अकस्मात का पर्यायवाची शब्द अचानक, यकायक, सहसा, तत्क्षण आदि होता है।

 

अनुमति का पर्यायवाची शब्द लिखे।

– अनुमति का पर्यायवाची शब्द सहमति, सम्मति, स्वीकृति आदि होता है।

 

अवसर का पर्यायवाची शब्द लिखे।

– अवसर का पर्यायवाची शब्द मौका , संयोग आदि होता है।

 

परिवर्तन का पर्यायवाची शब्द लिखे।

– परिवर्तन का पर्यायवाची शब्द बदलाव , रूपांतरण , दशान्तर आदि होता है।

 

सम्मान का पर्यायवाची शब्द लिखे।

– सम्मान का पर्यायवाची शब्द आदर , मान आदि होता है।

 

श्रम विभाजन और जाति प्रथा पाठ साहित्य की कौन सी विधा है?

– निबंध

 

श्रम विभाजन और जाति प्रथा शीर्षक पाठ के निबंधकार कौन है?

– डॉ. भीमराव अम्बेडकर

 

डॉ. भीमराव अम्बेडकर का परिचय दें।

 

डॉ. भीमराव अम्बेडकर का जन्म कब हुआ था?

– डॉ. भीमराव अम्बेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891ई. में हुआ था।

 

डॉ. भीमराव अंबेडकर का जन्म कहां हुआ था?

– डॉ. भीमराव अम्बेडकर का जन्म मध्यप्रदेश के इंदौर जिला के महू नामक स्थान पर हुआ था।

 

महू का वर्तमान नाम क्या है? महू अब किस नाम से जाना जाता है? महू का आधिकारिक नाम क्या है?

– महू का वर्तमान नाम डा. अम्बेडकर नगर है।

 

डॉ. भीमराव अम्बेडकर का निधन कब हुआ? डॉ. भीमराव अम्बेडकर की मृत्यु कब हुई थी? डॉ. भीमराव अम्बेडकर का देहांत कब हुआ था?

– डॉ. भीमराव अम्बेडकर की मृत्यु 6 दिसंबर 1956 ई. को दिल्ली में हुई थी।

 

डॉ. भीमराव अम्बेडकर की प्रमुख रचनाएं कौन-कौन सी है?

– डॉ भीमराव अम्बेडकर की प्रमुख रचनाएं द कास्ट्स इन इंडिया : देयर मैकेनिज्म , जेनेसिस एंड डेवलपमेंट , द अनटचेबल्स , हू आर दे , हू आर शूद्राज , बुद्धिज्म एंड कम्युनिज्म , बुद्धा एण्ड हिज धम्मा , थाट्स ऑन लिंग्युस्टिक स्टेट्स , द राइज एंड फाल ऑफ द हिन्दू वीमेन , एनीहिलेशन ऑफ कास्ट इत्यादि हैं।

 

हिंदी में डॉ. भीमराव अम्बेडकर का सम्पूर्ण साहित्य किस नाम से प्रकाशित है?

– हिंदी में डॉ. भीमराव अम्बेडकर का सम्पूर्ण साहित्य  ‘बाबा साहब अम्बेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय’ नाम से 21 खंडों में प्रकाशित है।

 

‘बाबा साहब अम्बेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय’ का प्रकाशन भारत सरकार के किस मंत्रालय के द्वारा किया गया है?

– कल्याण मंत्रालय

 

श्रम विभाजन और जाति प्रथा शीर्षक पाठ का प्रश्नोत्तर:-

प्रश्न संख्या – 01

लेखक किस विडंबना की बात करते हैं? विडंबना का स्वरूप क्या है?

उत्तर – लेखक आधुनिक युग के उस वज्र विडंबना की बात करते हैं जिसमें आज भी जातिवाद जैसे संकीर्ण, कुंठित और विषाक्त विचारधारा के असंख्य पोषक अथवा पक्षधर मौजूद है।
विडंबना का स्वरूप समतामूलक उदारता की बजाय जाति आधारित विषमता को बरकरार रखने का ओछा प्रयास है।

प्रश्न संख्या – 02

जातिवाद के पोषक उसके पक्ष में क्या तर्क देते हैं?

उत्तर– जातिवाद के पोषक उसके पक्ष में तर्क देते हैं कि आधुनिक सभ्य समाज ‘कार्य – कुशलता’ के लिए श्रम विभाजन को आवश्यक मानता है और जाति प्रथा भी श्रम विभाजन का ही दूसरा रूप है। अतः इसमें कोई बुराई नहीं है।

स्पष्टीकरण:-

यहां ‘कार्य-कुशलता’ का तात्पर्य किसी कार्य को कुशलता पूर्वक करने की क्षमता से है। मतलब की आप जो कार्य कर रहे हैं उसके बारे में आप पुरी जानकारी रखते हैं। न कि आधा-अधूरा जानकारी रखते हैं।

प्रश्न संख्या – 03

जातिवाद के पक्ष में दिए गए तर्कों पर लेखक की प्रमुख आपत्तियां क्या हैं?

उत्तर – जातिवाद के पक्ष में दिए गए तर्कों पर लेखक की प्रमुख आपत्तियां श्रम विभाजन का श्रमिक विभाजन के रूप में बदलना, पेशा का गर्भकालीन निर्धारण, पेशा परिवर्तन में अवसरों का अभाव , पेशा निर्धारण में व्यक्तिगत क्षमता, अभिरुचि या योग्यता की उपेक्षा आदि हैं।

स्पष्टीकरण:-

आइए श्रम विभाजन का श्रमिक विभाजन में बदलने का तात्पर्य समझते हैं। श्रम का अर्थ काम या कार्य जबकि श्रमिक का अर्थ काम करने वाले या कामगार होता है। यहां जो श्रम विभाजन के रूप में काम का विभाजन किया गया उसने श्रमिक विभाजन के रूप में कामगारों को ही ऊंच-नीच, छुआछूत जैसी विषमता में विभाजित कर दिया। इस स्थिति में पसीना बहाने वाले ही अछूत हो गये। जो सचमुच आपत्तिजनक है। पेशा निर्धारण में व्यक्तिगत इच्छा या शौक या योग्यता की बजाय पिता की जाति मानदंड है। तकनीकी विकास के कारण यदि किसी पैतृक पेशा या धंधा को बंद करना पड़े तो आप कौन सा नया धंधा करेंगे (ये उस समय की स्थितियां थीं हालांकि अब ऐसी बात नहीं है।)इस पर बिल्कुल विचार नहीं किया गया है।

प्रश्न संख्या – 04

जाति भारतीय समाज में श्रम विभाजन का स्वाभाविक रूप क्यों नहीं कही जा सकती?

उत्तर– जाति आधारित श्रम विभाजन श्रमिकों को व्यक्तिगत क्षमता, अभिरुचि, योग्यता आदि के आधार पर पेशा चुनने की सुविधा नहीं देती है।
       इसलिए जाति भारतीय समाज में श्रम विभाजन का स्वाभाविक रूप नहीं कही जा सकती।

प्रश्न संख्या – 05

जाति प्रथा भारत में बेरोजगारी का एक प्रमुख और प्रत्यक्ष कारण कैसे बनी हुई है?

उत्तर – औद्योगिकरण अथवा तकनीकी विकास के कारण प्रायः लोगों को अपना पेशा परिवर्तन करना पड़ता है परन्तु जाति आधारित पेशा निर्धारण पद्धति में उपरोक्त प्रतिकूल परिस्थितियों में भी पैतृक पेशा में परिवर्तन की अनुमति नहीं है।                                                                          इस तरह पैतृक पेशा परिवर्तन की अनुमति न देकर जाति प्रथा भारत में बेरोजगारी का प्रमुख और प्रत्यक्ष कारण बनी हुई है।

प्रश्न संख्या – 06

लेखक आज के उद्योगों में गरीबी और उत्पीड़न से भी बड़ी समस्या किसे मानते हैं और क्यों?

उत्तर – लेखक आज के उद्योगों में गरीबी और उत्पीड़न से भी बड़ी समस्या लोगों के द्वारा विवशता वश ‘निर्धारित कार्यों’ के अरुचि पूर्ण संपादन को मानते हैं।                                                                       क्योंकि ये मनुष्य के स्वाभाविक प्रेरणा रुचि और आत्म – शक्ति का दमन कर उन्हें निष्क्रिय बना देती है।

प्रश्न संख्या – 07

लेखक ने पाठ में किन प्रमुख पहलुओं से जाति प्रथा को एक हानिकारक प्रथा के रूप में दिखाया है?

उत्तर– लेखक ने पाठ में पेशा-निर्धारण के साथ – साथ सामाजिक, आर्थिक, प्रजातांत्रिक आदि पहलुओं से जाति प्रथा को एक हानिकारक प्रथा के रूप में दिखाया है।

प्रश्न संख्या – 08

सच्चे लोकतंत्र की स्थापना के लिए लेखक ने किन विशेषताओं को आवश्यक माना है?

उत्तर – सच्चे लोकतंत्र की स्थापना के लिए लेखक ने सामाजिक-स्वतंत्रता, समता, भाईचारा जैसी विशेषताओं को आवश्यक माना है।

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