नाखून क्यों बढ़ते हैं।

प्रिय शिक्षार्थियों! Vidyapuri.in के इस पोस्ट में प्रस्तुत पाठ “नाखून क्यों बढ़ते हैं” के प्रश्नोत्तर के साथ – साथ पाठ में प्रयोग किये गये मुहावरे का अर्थ, संयुक्त शब्दों का संधि-विच्छेद, कठिन शब्दों का शब्दार्थ, शब्दों की समझ को आसान बनाने हेतु चित्रों का प्रयोग, पारिभाषिक शब्दों की परिभाषा, पाठ का सारांश आदि का सटीक चित्रण किया गया है। आपके अध्ययन और अध्यापन में सहायक होने की उम्मीद से अपना प्रयास आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहा हूं:-

नाखून क्यों बढ़ते हैं? यह प्रश्न लेखक के आगे कैसे उपस्थित हुआ?

उत्तर – नाखून क्यों बढ़ते हैं? यह प्रश्न लेखक के आगे उनकी छोटी लड़की के द्वारा उपस्थित हुआ।

प्रश्न संख्या – 02

बढ़ते नाखूनों द्वारा प्रकृति मनुष्य को क्या याद दिलाती है?

उत्तर – बढ़ते नाखूनों द्वारा प्रकृति मनुष्य को यह याद दिलाती है कि तुम्हारे नाखून को भूलाया नहीं जा सकता। तुम आज भी पशुओं के साथ एक ही सतह पर चरने और विचरने वाले लाख वर्ष पहले के नख-दंताश्रित जीव हो।

प्रश्न संख्या – 03

लेखक द्वारा नाखूनों को अस्त्र के रूप में देखना कहां तक संगत है?

उत्तर – जब मानव बनमानुष जैसा जंगली था तब उन्हें जंगली जीवों से आत्मरक्षा के लिए प्रायः संघर्ष करना पड़ता था। संघर्ष के दौरान उनके द्वारा अपने विरोधियों को पछाड़ने के लिए अस्त्र के रूप में नाखूनों का ही प्रयोग किया जाता था।
                        इस प्रकार लेखक हजारी प्रसाद द्विवेदी जी द्वारा नाखूनों को अस्त्र के रूप में देखना बहुत हद तक तर्क संगत है।

प्रश्न संख्या – 04

मनुष्य बार-बार अपने नाखूनों को क्यों काटता है?

उत्तर – मनुष्य अपनी बर्बरता से मुक्त होकर सभ्य सामाजिक जीवन जीने लगा है। परन्तु अबतक उन्हें नाखून जैसे बर्बर युगीन अवशेषों से मुक्ति नहीं मिली है। नाखून के रूप में मौजूद यह भयंकर पाशविक प्रवाह उनके लिए असह्य है।
          इसलिए वह बार-बार अपने नाखूनों को काटता है।

प्रश्न संख्या – 05

सुकुमार विनोदों के लिए नाखूनों को उपयोग में लाना मनुष्यों ने कैसे शुरू किया? लेखक ने इस संबंध में क्या बताया है?

उत्तर – मनुष्यों ने अपने नाखूनों को त्रिकोण, गोलाकार, चन्द्राकार, दंतुल आदि मनोरंजक आकृतियां प्रदान कर सुकुमार विनोदों के लिए उपयोग में लाना शुरू किया।
                          लेखक ने इस संबंध में बताया है कि लोगों के द्वारा मोम और आलता की सहायता से अपने नाखूनों को यत्नपूर्वक चिकना और रंगीन बनाया जाता था। गौड़ देश यानि उत्तर भारत के लोगों को बड़े-बड़े नाखून जबकि दक्षिण भारत के लोगों को छोटे-छोटे नाखून रखना पसंद था।

प्रश्न संख्या – 06

नख बढ़ाना और उन्हें काटना कैसे मनुष्य की सहजात वृत्तियां हैं? इनका क्या अभिप्राय है?

उत्तर – मनुष्य के भीतर नख बढ़ाना और उन्हें काटना वास्तव में पशुता और मनुष्यता का द्वंद्वात्मक संघर्ष है और यह संघर्ष बर्बर युग के अवसान काल से ही निरंतर चलता आ रहा है।  इस प्रकार इस शाश्वत संघर्ष से यह सिद्ध होता है कि नख बढ़ाना और उन्हें काटना मनुष्य की सहजात वृत्तियां हैं।
               इनका अभिप्राय यह है कि मनुष्य ने हजारों वर्ष पहले अपनी बर्बरता छोड़ दी, परन्तु उनके अवशेषों से अबतक उन्हें मुक्ति नहीं मिल पायी है।

प्रश्न संख्या – 07

लेखक क्यों पूछता है कि मनुष्य किस ओर बढ़ रहा है, पशुता की ओर या मनुष्यता की ओर? स्पष्ट करें।

उत्तर – लेखक के अनुसार एक ओर मनुष्य अपने बर्बर युगीन अस्त्र ‘नाखून’ को काटकर मनुष्यता का प्रदर्शन कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर वे गोली, बंदुक, बम, बारुद आदि का व्यापक पैमाने पर निर्माण कर पशुता का परिचय भी दे रहे हैं।
लेखक मनुष्य के इसी दोहरे चरित्र के कारण पूछता है कि मनुष्य किस ओर बढ़ रहा है, पशुता की ओर या मनुष्यता की ओर।

प्रश्न संख्या – 08

देश की आजादी के लिए प्रयुक्त किन शब्दों की अर्थ मीमांसा लेखक करता है और लेखक के निष्कर्ष क्या है?

उत्तर – लेखक देश की आजादी के लिए प्रयुक्त स्वतंत्रता, स्वराज्य, स्वाधीनता आदि शब्दों की अर्थ मीमांसा करता है। लेखक के अनुसार आजादी के लिए अंग्रेजी समाचार पत्रों ने जहां ‘इंडिपेंडेंस’ शब्द का प्रयोग किया था वहीं देशी समाचार पत्रों में ‘स्वाधीनता’ की चर्चा चल रही थी। ‘इंडिपेंडेंस’ का शाब्दिक अर्थ ‘अनधीनता’ या ‘अधीनता का अभाव’ होता है, जबकि स्वाधीनता का शाब्दिक अर्थ ‘अपने अधीन रहना’ होता है।
आजादी के लिए प्रयुक्त दोनों शब्दों के आपसी विरोधाभास के कारण लेखक इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि अपने दीर्घकालिक संस्कारों या सहजात वृत्तियों के कारण भारतीय चित्त आज भी ‘अनधीनता’ की बजाय ‘स्वाधीनता’ के बारे में सोचता है।

प्रश्न संख्या – 09

लेखक ने किस प्रसंग में कहा है कि बंदरिया मनुष्य का आदर्श नहीं बन सकती ? लेखक का अभिप्राय स्पष्ट करें।

उत्तर – लेखक ने सांस्कृतिक जुड़ाव के प्रसंग में कहा है कि बंदरिया मनुष्य का आदर्श नहीं बन सकती क्योंकि वह अपने मरे हुए बच्चों को भी गोद में दबाए रहती है। इस प्रसंग से लेखक का अभिप्राय यह है कि हमें अपने अनावश्यक या रूढ़िवादी परम्पराओं का त्याग कर समकालीन अच्छाईयों को भी सहज भाव से स्वीकार करना चाहिए। कोई राष्ट्र अथवा संस्कृति तभी तक जीवंत रहते हैं जब तक उनमें अपनी बुराईयों को त्यागने और अच्छाईयों को अपनाने की शक्ति रहती है।

प्रश्न संख्या – 10

‘स्वाधीनता’ शब्द की सार्थकता लेखक क्या बताता है?

उत्तर – लेखक हजारी प्रसाद द्विवेदी जी के अनुसार भारतीय चित्त ने अपने दीर्घकालिक संस्कारों के कारण, अपनी आजादी को ‘अनधीनता’ की बजाय ‘स्वाधीनता’ के रूप में स्वीकार किया। आजादी के इतने वर्ष बाद भी किसी ने ‘अनधीनता’ का जिक्र नहीं किया और न ही ‘स्वाधीनता’ पर प्रश्न किया।
                      लेखक ‘स्वाधीनता’ शब्द की इसी सर्व स्वीकार्यता को उसकी सार्थकता बताता है।

प्रश्न संख्या – 11

निबंध में लेखक ने किस बूढ़े का जिक्र किया है? लेखक की दृष्टि में बूढ़े के कथनों की सार्थकता क्या है?

उत्तर – निबंध में लेखक हजारी प्रसाद द्विवेदी ने बूढ़े के रूप में गांधी जी का जिक्र किया है। क्योंकि सत्य, अहिंसा, प्रेम, आत्म उत्थान आदि कथनों का प्रत्यक्ष संबंध उन्हीं से हैं और गोली भी उन्हीं को मारी गयी थी।
                               लेखक की दृष्टि में बूढ़े के कथनों की सार्थकता मानव जीवन को चरितार्थ करने में है।

प्रश्न संख्या – 12

मनुष्य की पूंछ की तरह उसके नाखून भी एक दिन झड़ जाएंगे। – प्राणिशास्त्रियों के इस अनुमान से लेखक के मन में कैसी आशा जगती है?

उत्तर – मनुष्य की पूंछ की तरह उसके नाखून भी एक दिन झड़ जाएंगे – प्राणीशास्त्रियों के इस अनुमान से लेखक के मन में पशुता पर मनुष्यता की विजयी होने की आशा जगती है। वस्तुत: लेखक संसार में सर्वत्र सुख, शांति, समृद्धि, स्थिरता आदि की स्थापना के प्रति आशान्वित हैं।

प्रश्न संख्या – 13

‘सफलता’ और ‘चरितार्थता’ शब्दों में लेखक अर्थ की भिन्नता किस प्रकार प्रतिपादित करता है?

उत्तर – निबंधकार हजारी प्रसाद द्विवेदी जी के अनुसार ‘सफलता’ शब्द का आशय जीवन के बाह्य संसाधनों जैसे – धन-संपत्ति, पद-प्रतिष्ठा, अस्त्र-शस्त्र, बाहुबल आदि से है। जबकि ‘चरितार्थता’ शब्द का आशय जीवन के आंतरिक संसाधनों जैसे – प्रेम, मैत्री, परहित चिंतन, त्याग, समर्पण आदि से है।
                    इस प्रकार लेखक ‘सफलता’ और ‘चरितार्थता’ में अर्थ भिन्नता प्रतिपादित करता है।

प्रश्न संख्या -14

व्याख्या करें ।

(क) काट दीजिए, वे चुपचाप दंड स्वीकार कर लेंगे; पर निर्लज्ज अपराधी की भांति फिर छुटते ही सेंध पर हाजिर।

– प्रस्तुत पंक्तियां गद्यांश गोधूलि भाग – 2 में संकलित ‘नाखून क्यों बढ़ते हैं’ शीर्षक पाठ से संबंधित है। जिसके रचयिता हिन्दी साहित्य के मूर्धन्य साहित्यकार हजारी प्रसाद द्विवेदी जी हैं।
      उक्त पंक्तियों के माध्यम से द्विवेदी जी ने नाखून के स्वाभाविक चरित्र का चित्रण किया है। यहां नाखून एक प्रतीकात्मक प्रतिबिंब है जो मनुष्य में मौजूद अवगुणों का प्रतिनिधित्व करता है। लेखक के अनुसार बढ़े हुए नाखूनों को बारम्बार काटने पर भी वे प्रतिकार अथवा विरोध नहीं करते हैं परन्तु कुछ दिनों के बाद पुनः बढ़ जाते हैं।
लेखक ने नाखून के इस हठधर्मिता की तुलना निर्लज्ज अपराधी से की है। उनके अनुसार मनुष्यों में मौजूद अवगुणों की दशा भी इससे अधिक अलग नहीं है। सामान्य मनुष्य जब किसी सज्जन के प्रभाव में आकर अपने भीतर के अवगुणों से मुक्त होने का निश्चय करते हैं, तो कुछ दिन के लिए वे ऐसा करने में अवश्य कामयाब रहते हैं। परन्तु सज्जनता का प्रभाव जैसे – जैसे कम होता है, वैसे – वैसे वे उन्हीं अवगुणों के आगोश में आने लगते हैं।
        अतः मनुष्यों को सज्जनों के साथ शाश्वत संगति करनी चाहिए। ताकि जीवन में पशुता की बजाय मनुष्यता का दीर्घकालिक प्रभाव स्थापित हो सके। ऐसा सम्पूर्ण सृष्टि में प्रेम, अहिंसा, मैत्री आदि के लिए की स्थापना के लिए आवश्यक है।

(ख) मैं मनुष्य के नाखून की ओर देखता हूं तो कभी – कभी निराश हो जाता हूं।

– प्रस्तुत पंक्ति गोधूलि भाग – 2 में संकलित ‘नाखून क्यों बढ़ते हैं’ शीर्षक पाठ से सम्बद्ध है। जिसके रचयिता हिन्दी साहित्य के  मूर्धन्य और लब्ध प्रतिष्ठित रचनाकार हजारी प्रसाद द्विवेदी जी हैं।
                               उक्त पंक्ति के माध्यम से निबंधकार द्विवेदी जी ने नाखून से जुड़ी अपनी  मनोविकृति को व्यक्त किया है। उनके अनुसार नाखून भयंकर पाशविक प्रवृत्ति का जीवंत प्रतीक है। यह मनुष्यों के लिए बर्बर युग में निसंदेह आवश्यक अंग था, क्योंकि उस समय उन्हें जीवन-यापन करने के लिए जंगली जीवों से प्रायः संघर्ष करना पड़ता था। आहार संग्रह, रात्रि विश्राम, आक्रमण के खतरों आदि के कारण वे अक्सर अस्थिर रहा करते थे। जब कभी जानवरों का आक्रमण होता था तो वे नाखूनों से अपनी रक्षा करता था।
              कालचक्र के परिवर्तन से मनुष्यों ने सभ्यता पूर्वक सामाजिक जीवन व्यतीत करना आरम्भ कर दिया परन्तु प्रकृति ने बर्बर युग के उस औजार से उन्हें वंचित नहीं किया, जो किसी भी सभ्य मानव के लिए घोर निराशाजनक है।
                            वास्तव में लेखक नाखून के इस प्रतीकात्मकता की सहायता से मनुष्यों में व्याप्त बर्बर युगीन “खतरों के भय” को लेकर चिंतित है। लेखक के अनुसार मनुष्यों ने भौतिक सुख – सुविधाओं (गाड़ी,बंगला आदि) का तो व्यापक पैमाने पर प्रबंधन कर लिया है लेकिन मानसिक रूप से बर्बर युगीन “खतरों के भय” से मुक्त नहीं हो पाए और इस दिशा में उनकी उपलब्धियां लगभग शून्य है। इस ‘मानसिक भय’ के कारण पूरी दुनिया में हथियारों की होड़ लगी है। हिरोशिमा, नागासाकी आदि इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। अतः मनुष्यों को पारस्परिक सुख, शांति, मैत्री आदि की स्थापना हेतु निश्छल हृदय से पहल करने की आवश्यकता है।

(ग) कमबख्त नाखून बढ़ते हैं तो बढ़ें, मनुष्य उन्हें बढ़ने नहीं देगा।

– प्रस्तुत पंक्ति गोधूलि भाग – 2 में संकलित ‘नाखून क्यों बढ़ते हैं’ शीर्षक निबंध से संबंधित है। जिसके रचयिता हिन्दी साहित्य के प्रख्यात साहित्यविद् हजारी प्रसाद द्विवेदी जी हैं।
                          उक्त पंक्ति के माध्यम से निबंधकार द्विवेदी जी का आशावादी दृष्टिकोण मुखरित होता है। लेखक निबंध के अंतिम चरण में इस निर्णय पर पहुंचते हैं कि कमबख्त नाखून बढ़ते हैं तो बढ़े लेकिन मनुष्य उन्हें बढ़ने नहीं देगा। लेखक के इस दृढ़ विश्वास के पिछे मनुष्यों का मनुष्यता की ओर अग्रसर होना है क्योंकि बर्बर युग के इस अवशेष से मुक्त होने के लिए मनुष्य का निरंतर प्रयास प्रदीप्त हो रहा है।
               लेखक के अनुसार मनुष्यों को आवश्यक रूप से आशावादी होना चाहिए अन्यथा नकारात्मकता उन पर प्रभावी हो जाएगा और जीवन के मौलिक उद्देश्य से वे भटक जाएंगे। इस संदर्भ में लेखक ने सफलता और चरितार्थता का जिक्र किया है। लेखक के अनुसार सफलता और चरितार्थता का आवश्यक संतुलन मानव जीवन का सार है। मानव जिस दिन सफलता और चरितार्थता में व्याप्त अंतर से भली-भांति परिचित हो जाएंगे उस दिन वे पारस्परिक खतरों के भय से मुक्त होकर जीवन को मैत्री भाव से जीना आरंभ कर देंगे। फिर इन नाखूनों का असर स्वत: समाप्त हो जाएगा।
निबंधकार हजारी प्रसाद द्विवेदी जी के अनुसार ‘सफलता’ शब्द का आशय जीवन के बाह्य संसाधनों जैसे – धन-संपत्ति, पद-प्रतिष्ठा, अस्त्र-शस्त्र, बाहुबल आदि से है। जबकि ‘चरितार्थता’ शब्द का आशय जीवन के आंतरिक संसाधनों जैसे – प्रेम, मैत्री, परहित चिंतन, त्याग, समर्पण आदि से है।
           लेखक उक्त समझ के आधार पर ही इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि कमबख्त नाखून बढ़ते हैं तो बढ़े, मनुष्य उन्हें बढ़ने नहीं देगा।

प्रश्न संख्या – 15

लेखक की दृष्टि में हमारी संस्कृति की बड़ी भारी विशेषता क्या है? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर  लेखक हजारी प्रसाद द्विवेदी जी की दृष्टि में हमारी संस्कृति की बड़ी भारी विशेषता अपने – आप पर अपने – आप के द्वारा लगाया हुआ आत्मनिर्मित बंधन है। यह आत्मनिर्मित बंधन ‘स्व’ आधारित है जो हमारे दीर्घकालिक संस्कारों के फलस्वरूप हमें मिले हैं। स्वयं को आत्मानुशासन की परिधि में सीमित रखना किसी साधना से कम नहीं है लेकिन हमारी संस्कृति ने हमें इसके अनुकूल बना दिया है।

प्रश्न संख्या – 16

‘नाखून क्यों बढ़ते हैं’ का सारांश प्रस्तुत करें।

उत्तर – ‘नाखून क्यों बढ़ते हैं’ शीर्षक पाठ हजारी प्रसाद द्विवेदी जी द्वारा विरचित एक ललित निबंध है। लेखक के अनुसार बच्चे कभी – कभी चक्कर में डाल देनेवाले प्रश्न कर बैठते हैं। अल्पज्ञ पिता की स्थिति तो और भी  दयनीय होती है। लेखक के सामने यह प्रश्न उनकी लड़की के द्वारा उपस्थित होता है कि नाखून क्यों बढ़ते हैं। लेखक विस्मित होकर विचार करने लगे कि बार – बार काट देने पर भी ये नख निर्लज्ज अपराधी की भांति सेंध पर हाजिर क्यों  हो जाते हैं? आज माता – पिता अपने बच्चों को नाखून रखने पर डांटते हैं परंतु कुछ लाख वर्ष पहले जंगली वातावरण में  नाखून को नष्ट करने पर बच्चों को डांटते होंगे क्योंकि यह उनकी सुरक्षा के लिए आवश्यक हथियार का काम करता था। नाखूनों की सहायता से ही वे अपने प्रतिद्वंदियों से मुकाबला करते थे। धीरे – धीरे उसने बाहरी हथियारों के रूप में पेड़ों की डालियां, मिट्टी, पत्थर आदि के ढेले, धनुष-बाण, गदा, भाला आदि का सहारा लेने लगा। समय का चक्र आगे बढ़ा और हड्डियों के अस्त्र बनने लगे। हड्डियों के अस्त्र में सबसे शक्तिशाली देवराज इन्द्र का ‘वज्र’ था जिसका निर्माण दधिचि मुनि की हड्डियों से हुआ था। देवासुर संग्राम में देवताओं को भी मनुष्यों के राजा से सहयोग लेना पड़ा था क्योंकि उसके पास लोहा जैसे धातुओं के अस्त्र – शस्त्र था।
                                   अस्त्र – शस्त्र की प्रतिस्पर्धा की गतिशीलता आधुनिक सभ्य समाज में भी बरकरार रही, पलीतेवाली बंदूक से एटम बम तक की यात्रा में मानवता ने हिरोशिमा, नागासाकी, जर्मनी होलोकास्ट आदि के रूप में अपना सबकुछ गंवा दिया। प्रकृति नाखून प्रदान करते हुए मनुष्यों को यह याद दिलाती है कि तुम्हारे नाखून को भुलाया नहीं जा सकता। तुम आज भी वही लाख वर्ष पहले के नख – दंतावलंबी जीव हो….पशु के साथ एक ही सतह पर विचरण करने वाले और चरने वाले। लेखक नाखून को देखकर हैरान होते हुए कहते हैं कि प्रकृति नाखून को व्यर्थ ही जिलाए जा रही है। अब मनुष्यों को नाखून की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि उसने इससे करोड़ों गुना अधिक शक्तिशाली मरणास्त्रों का निर्माण कर लिया है। मनुष्य के लिए नाखून असह्य है, क्योंकि वे इसे बर्बर युग का अवशेष मानते हैं और इसलिए वे बार – बार अपने नाखूनों को काटते हैं।
                            वात्स्यायन के कामसूत्र से पता चलता है कि आज से दो हजार वर्ष पहले का भारतवासी नाखून को सुकुमार विनोदों के रूप में उपयोग में लाना शुरू किया और उसे जमकर संवारता था। वे नाखून को त्रिकोण, वर्तुलाकार, चंद्राकार, दंतुल आदि मनोरंजन आकृतियों में काटकर मोम और आलता से चिकना और रंग-बिरंगे बनाते थे। गौड़ देश यानि उत्तर भारत के लोग बड़े नाखून जबकि दक्षिण भारत के लोग छोटे नाखून रखना पसंद करते थे।
      प्राणि वैज्ञानिकों के अनुसार मानव – चित्त की भांति मानव शरीर में भी बहुत से अभ्यास – जन्य सहज वृत्तियां रह गई है। नाखून, बाल आदि का बढ़ना भी अभ्यास – जन्य सहज वृत्तियों का ही उदाहरण है। मनुष्य के भीतर नख का बढ़ना पशुता का प्रमाण और उसे काटने की प्रवृत्ति मनुष्यता की निशानी है। जिस प्रकार नाखूनों का बढ़ना पशुता का प्रतीक है, उसी प्रकार अस्त्र बढ़ाने की प्रवृत्ति मनुष्यता की विरोधिनी है। अपने व्यावहारिक जीवन में मनुष्य नाखून को काटकर मनुष्यता का परिचय तो देते हैं लेकिन बाहरी अस्त्र – शस्त्र की प्रतिस्पर्धा में किसी से पीछे नहीं रहना चाहते हैं। लेखक मनुष्य के इस दोहरे चरित्र पर प्रहार करते हुए पूछते हैं कि मनुष्य किस ओर बढ़ रहा है पशुता की ओर या फिर मनुष्यता की ओर? लेखक अन्ततः मनुष्य के पशुता की ओर बढ़ने की धारणा की पुष्टि करते हुए प्रतीत होते हैं।
                                      भारत के स्वतंत्रता दिवस के लिए अंग्रेजी में ‘इंडिपेंडेंस डे’ शब्द प्रयुक्त होता है। वास्तव में ‘इंडिपेंडेंस’ शब्द का हिंदी ‘अनधीनता’ या ‘अधीनता का अभाव होना’ होता है। लेकिन भारत की आजादी के लिए प्रयुक्त स्वतंत्रता, स्वाधीनता, स्वराज्य आदि सभी जगह ‘स्व’ आधारित बंधन का पालन हुआ है, जो हमारी भाषाई संस्कृति की विशेषता को दर्शाती है। हमारे दीर्घकालिक संस्कारों के परिणामस्वरूप भारतीय चित्त आज भी ‘अधीनता’ को ‘स्वाधीनता’ के रूप में ही स्वीकार करता है। अपने – आप पर अपने – आप का बंधन लगाना हमारी संस्कृति की भारी विशेषता है। भारतीय संस्कृति में समय के सापेक्ष यथोचित परिवर्तन भी होता रहा है। इस संदर्भ में लेखक ने कालिदास के उस कथन का जिक्र किया है जिसमें उसने कहा था कि सब पुराने अच्छे नहीं होते, सब नए खराब ही नहीं होते। भले लोग दोनों की जांच कर लेते हैं और जो हितकर होते हैं उसे ग्रहण करता है।
                                 लेखक के अनुसार महाभारत में निर्वैर भाव, सत्य और अक्रोध को सभी वर्णों का सामान्य धर्म कहा गया है। उन्होंने गौतम ऋषि, गांधीजी आदि विद्वानों के विचारों का वर्णन करते हुए कहा है कि मनुष्य की मनुष्यता सबों के सुख-दुख में सहानुभूति पूर्वक शामिल होने से सिद्ध होती है। मनुष्यों को अपने भीतर मौजूद असत्य, हिंसा, द्वेष, क्रोध आदि मनोविकार को त्यागकर जीवन की सफलता की बजाय उसकी सार्थकता पर आत्मकेंद्रित होना चाहिए ताकि सृष्टि में सर्वत्र सुख, शांति, समृद्धि, स्थिरता आदि की कल्पना साकार हो सके।

‘नाखून क्यों बढ़ते हैं।’ शीर्षक पाठ से संबंधित संधि – विच्छेद:-

अल्पज्ञ का संधि विच्छेद करें।

– अल्प + ज्ञ = अल्पज्ञ

निर्लज्ज का संधि विच्छेद करें।

– नि: + लज्ज = निर्लज्ज

दंतावलंबी का संधि – विच्छेद करें।

– दंत + अवलंबी = दंतावलंबी

नष्ट का संधि विच्छेद करें।

– नष् + त = नष्ट

निराश का संधि विच्छेद करें।

– नि: + आशा = निराश

मनोरंजक का संधि विच्छेद करें।

– मन: + रंजक = मनोरंजक

वर्तुलाकार का संधि विच्छेद करें।

– वर्तुल + आकार = वर्तुलाकार

चन्द्राकार का संधि विच्छेद करें।

– चन्द्र + आकार = चन्द्राकार

अधोगामिनी का संधि विच्छेद करें।

– अध: + गामिनी = अधोगामिनी

मनुष्योचित का संधि विच्छेद करें।

– मनुष्य + उचित = मनुष्योचित

अध्ययन का संधि विच्छेद करें।

– अधि + अयन = अध्ययन

अभ्यास का संधि विच्छेद करें।

– अभि + अयास = अभ्यास

अतएव का संधि विच्छेद करें।

– अत: + एव = अतएव

यद्यपि का संधि विच्छेद करें।

– यदि + अपि = यद्यपि

अनायास का संधि विच्छेद करें।

– अन् + आयास = अनायास

निर्बोध का संधि विच्छेद करें।

– नि: + बोध = निर्बोध

समानार्थक का संधि विच्छेद करें।

– समान + अर्थक = समानार्थक

संयोग का संधि विच्छेद करें।

– सम् + योग = संयोग

इतिहास का संधि विच्छेद करें।

– इति + हाल = इतिहास

असत्याचरण का संधि विच्छेद करें।

– असत्य + आचरण = असत्याचरण

स्वाधीन का संधि विच्छेद करें।

– स्व + अधीन = स्वाधीन

निर्वैर का संधि विच्छेद करें।

– नि: + वैर = निर्वैर

मरणास्त्र का संधि विच्छेद करें।

– मरण + अस्त्र = मरणास्त्र

मनोभाव का संधि विच्छेद करें।

– मन: + भाव = मनोभाव

‘नाखून क्यों बढ़ते हैं’ पाठ का मुहावरा और उनका अर्थ लिखें।

क्कर में डालना – भ्रम या परेशानी में डालना
इशारे पर नाचना – किसी के वश में हो जाना
सहज बात नहीं होना – आसान नहीं होना
लोहा लेना – मुकाबला करना / प्रतिस्पर्धा करना
कमर कसना – तैयार होना/लड़ाई की तैयारी करना
हावी होना – भारी पड़ना।

‘नाखून क्यों बढ़ते हैं’ पाठ के कठिन या पारिभाषिक शब्द:-

बनमानुष क्या है? बनमानुष किसे कहते हैं?

– वनों अथवा जंगलों में रहने वाले पूंछरहित बंदरों की वैसी जाति जो मनुष्य की तरह दो पैरों पर चलते हैं, उसे बनमानुष कहते हैं।

अस्त्र क्या है? अस्त्र किसे कहते हैं? अस्त्र से आप क्या समझते हैं?

– वैसे घातक हथियार जिसे लक्ष्य की ओर किसी मंत्र अथवा यंत्र या फिर हाथों से फेंककर वार किया जाता है, उसे अस्त्र कहते हैं। जैसे :- तीर, गोली, सुदर्शनचक्र, गोली, भाला आदि

शस्त्र क्या है? शस्त्र किसे कहते हैं? शस्त्र से आप क्या समझते हैं?

– शत्रुओं से रक्षा या उस पर प्रहार करने के लिए हाथ में रखकर चलाये जाने वाले हथियारों को शस्त्र कहते हैं। जैसे :- धनुष, तलवार, गदा, फरसा, त्रिशूल आदि

अस्त्र-शस्त्र किसे कहते हैं? अस्त्र और शस्त्र में क्या अंतर है?

– वैसे हथियार जिसे हाथ से या शस्त्रों की सहायता से फेंककर प्रहार किया जाता है उसे अस्त्र कहते हैं। जबकि वैसे हथियार जिसे हाथ में रखकर चलाया जाता है, उसे शस्त्र कहते हैं। नोट – तीर-धनुष, गोली-बंदूक आदि क्रमशः अस्त्र-शस्त्र है।

वानरी सेना / वानर सेना किसे कहते हैं? वानरी सेना / वानर सेना क्या है? वानरी सेना / वानर सेना से आप क्या समझते हैं?

– किष्किंधा राज्य के राजा सुग्रीव के बंदरों की सेना को वानरी सेना / वानर सेना कहते हैं। माता सीता की खोज और रावण के साथ युद्ध में भगवान राम के साथ यही सेना थी। यहां ‘वानरी’ का अर्थ वन से संबंधित भी हो सकता है। कुछ विद्वानों के द्वारा वानर को बंदर के संदर्भ में देखा जाता है। वास्तव में ‘वानर’ शब्द की उत्पत्ति ‘वन’ और ‘नर’ शब्द के योग से हुआ है जिसका शाब्दिक अर्थ ‘वन में रहने वाला नर’ होता है।

वज्र किसे कहते हैं? वज्र क्या है? वज्र से आप क्या समझते हैं?

– देवराज इंद्र का वह शस्त्र जिसका निर्माण दधीचि मुनि की हड्डियों से त्वष्टा नामक प्रजापति ने वृत्रासुर नामक असुर के संहार के लिए किया था, उसी शस्त्र को वज्र कहते हैं।

दधीचि मुनि कौन थे?

– दधीचि मुनि एक वेद ऋषि थे। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार दधीची मुनि के पिता का नाम ‘अथर्वा’ और माता का नाम ‘चित्ति’ था। इन्हीं की हड्डियों से इन्द्र को ‘वज्र’ नामक शस्त्र की प्राप्ति हुई थी।

देवताओं के राजा कौन थे?

– देवताओं के राजा इंद्र थे।

देवताओं के राजा ने मनुष्य के किस राजा से सहायता ली थी?

– देवताओं के राजा ने मनुष्य के राजा ‘दशरथ’ से सहायता ली थी। 

असुर कौन थे?

– हिंदू धर्मग्रंथो के अनुसार देवी – देवताओं के साथ सतत संघर्ष करने वाले दैत्य, दानव, राक्षस आदि असुर थे।

पलीतेवाली बंदूक क्या है? पलीतेवली बंदूक किसे कहते हैं? पलीतेवाली बंदूक से आप क्या समझते हैं?

– वैसी आरंभिक बंदूकें जिसमें पलीते के रूप में कागज अथवा रस्सी से बनी बत्ती लगी रहती थी, उसे पलीतेवाली बंदूक कहते हैं। बंदूक को चलाने के लिए उस पलीते में आग लगाई जाती थी। इसका आविष्कार चीन में हुआ था।

आर्य कौन थे?

– ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार आर्य सिंधु घाटी क्षेत्र से भारत में आकर बसने वाले युद्धप्रिय प्रजाति थे, जिसने भारत में वैदिक सभ्यता की नींव रखी थी।

 बमवर्षक वायुयान किसे कहते हैं? बमवर्षक वायुयान से आप क्या समझते हैं?

– वैसे वायुयान जिसका उपयोग युद्ध के समय शत्रुओं के ऊपर बम आदि विस्फोटक गिराने के लिए किया जाता है, उसे बमवर्षक वायुयान कहते हैं।

तोप क्या है? तोप किसे कहते हैं? तोप से आप क्या समझते हैं?

– वह भारी और विशाल अस्त्र जिसकी सहायता से विस्फोटकों के गोले को शत्रुओं की ओर फेंका जाता है, उसे तोप कहते हैं।

एटम बम क्या है? एटम बम किसे कहते हैं? एटम बम से आप क्या समझते हैं?

– एटम बम एक महविनाशक आयुध है, जो नाभिकीय विखंडन अथवा नाभिकीय संलयन के सिद्धांत पर काम करता है। इसके विस्फोट से विशाल मात्रा में ऊष्मा और खतरनाक रेडिएशन मुक्त होता है। इसे परमाणु बम भी कहा जाता है। इसके जनक जूलियस रॉबर्ट ओपेनहाइमर थे।

 बर्बर युग क्या है? बर्बर युग किसे कहते हैं? बर्बर युग से आप क्या समझते हैं?

– वह युग अथवा कालखंड जिसमें मानव अथवा आदिमानव जंगलों में अव्यवस्थित रूप से अपना जीवनयापन करते थे, उसे बर्बर युग कहते हैं।

हिरोशिमा हत्याकांड अथवा हिरोशिमा कांड से आप क्या समझते हैं?

– हिरोशिमा हत्याकांड द्वितीय विश्व युद्ध के अंतिम चरण में अमेरिका के द्वारा किया गया एक वीभत्स युद्ध अपराध था, जिसमें उसके द्वारा 6 अगस्त 1945 ई को सुबह 8:15 बजे जापान के हिरोशिमा शहर में ‘लिटिल बॉय’ नमक परमाणु बम गिराया गया था। उस बम के विस्फोट के कारण कारण जापान में लगभग डेढ़ लाख लोग मारे गए थे।

कामसूत्र क्या है?

– कामसूत्र महर्षि वात्स्यायन द्वारा रचित एक प्रेमग्रंथ है, जिसमें प्रेम की प्रकृति, संभोग कला, जीवनसाथी की खोज आदि पर विस्तारपूर्वक प्रकाश डाला गया है।

 संस्कृति क्या हैं? संस्कृति किसे कहते हैं? संस्कृति से आप क्या समझते हैं?

– मनुष्यों के द्वारा संस्कार स्वरूप अपने पूर्वजों से प्राप्त रीति – रिवाज, अचार – विचार, रहन – सहन, विधि – विधान, परम्परा आदि के समयोचित प्रदर्शन को सामूहिक रूप से संस्कृति कहते हैं। जैसे:- अतिथि आदि के आगमन पर उनका पैर छूकर आशीर्वाद लेना और उनका आदर – सत्कार करना हमारी संस्कृति है।

सभ्यता क्या हैं? सभ्यता किसे कहते हैं? सभ्यता से आप क्या समझते हैं?

– सामाजिक स्तर पर भौतिक संसाधनों और सुविधाओं की दिशा में होने वाले निरंतर सुधार या विकास को सभ्यता कहते हैं। जैसे – सिंधु घाटी सभ्यता, माया सभ्यता आदि। इन सभ्यताओं के बारे में जब भी बात की जाती है तो इनकी शिल्प कला, संरचना, व्यापार व्यवस्था, रहन-सहन, सुख – सुविधा आदि की चर्चा पर विशेष बल दिया जाता है।

नाग कौन था ? नाग को किसने हराया था ? नाग किससे हारा था ?

– पौराणिक मान्यताओं के अनुसार नाग एक शक्तिशाली और बुद्धिमान सांपों का समुदाय था। पक्षीराज गरुड़ ने उस पर आक्रमण कर उसे हराया था।

सुपर्ण कौन था ? सुपर्ण को किसने हराया था ? सुपर्ण किससे हारा था ?

– हिंदू और बौद्ध धर्मग्रंथों के अनुसार सुपर्ण या गरुड़ एक शक्तिशाली और बुद्धिमान पक्षी था जिसके पिता कश्यप ऋषि थे। रामायण के अनुसार सुर्पण या गरुड़ को रावण ने पराजित किया था। हालांकि सुपर्ण और गरुड़ के एक होने को लेकर कई मतभेद भी है।

यक्ष कौन थे? उसे किसने हराया था?

– यक्ष एक पौराणिक असुर पात्र थे जिसकी ख्याति रक्षक के रूप में थी। यक्ष को कुबेर ने हराया था।

गंधर्व कौन थे? गंधर्व को किसने हराया था?

– हिन्दू धर्मग्रंथ के अनुसार गंधर्व इन्द्रलोक की परियों के पति थे जो गायन, वादन आदि करते थे। महाभारत कथा के अनुसार गंधर्व को पांडवों ने हराया था, क्योंकि उसने दुर्योधन को बंधक बना लिया था।

कालिदास कौन थे?

– कालिदास संस्कृत के आदिकवि थे। उन्होंने ही ‘रघुवंशम्’ महाकाव्य की रचना की थी।

‘नाखून क्यों बढ़ते हैं’ पाठ के कठिन शब्द और शब्दार्थों की सूची:-

चक्कर – भ्रम, असमंजस।
अल्पज्ञ – काम ज्ञान वाले, अल्प ज्ञान वाले, थोड़े ज्ञान वाले।

दयनीय – दया करने योग्य, दया के अधिकारी, दया के पात्र।

दंड – सजा।

अभागा – दुर्भाग्यशाली।

जूझना – संघर्ष करना।

सेंध – चोरी के उद्देश्य से खोदा गया सुरंग।

बेहया – बेशर्म, निर्ल्लज।

प्रतिद्वंद्वी – सामने वाले प्रतिस्पर्धी।

ढेले – मिट्टी या पत्थर के अनियमित आकार वाले टुकड़े

कारतूस – बंदूक की गोली

घाट – किनारे, नदी के किनारे का वह स्थान जहां से यातायात के लिए नाव या अन्य जलयान मिलते हैं।

भरोसा – विश्वास

वंचित – मनाही, दूर, अलग, रहित

नख – दंतावलंबी – नाखून और दांत पर आश्रित

विचरण – भ्रमण, चहलकदमी

तत: किम् – फिर क्या, इसके बाद क्या।

हैरान – आश्चर्यचकित, विस्मित, उलझन के अधीन

कमबख्त – बदनसीब, अभागा

अवशेष – बचा हुआ अंश, शेष भाग

असह्य – सहन करने योग्य नहीं

निराश – उदास, व्यथित, आशाहीनता के कारण उत्पन्न चिंता की स्थिति

भयंकर – बिकराल, भीषण, डरावनी

पाशवी – पशु सम्मत , पशुता से प्रेरित

वृत्ति – आचरण, कार्य, जीविका

पाशवी वृत्ति – पशु सम्मत आचरण

प्रतीक – चिन्ह, संकेत

सुकुमार – कोमल, मुलायम

विनोद – मनोरंजन

त्रिकोण – तीन कोण वाला

वर्तुलाकार – वृत्ताकार, घुमावदार, गोलाकार

चंद्राकर – चन्द्रमा के आकार में

दंतुल – दांत के समान, दांत की आकृति।

विलासी नागरिक– सुख – भोग की चाह रखने वाले व्यक्ति

यत्नपूर्वक – परिश्रमपूर्वक

चिकना – तैलीय, सपाट

गौड़ देश – उत्तर भारत। बंगाल का पुराना नाम।

दाक्षिणात्य – दक्षिण भारत से संबंधित।

रूचि – इच्छा, चाहत।

अधोगामिनी – नीचे या निम्नता की ओर ले जाने वाली।

मत – तर्कसंगत विचार, सिद्धांत।

चित्त – मनोवृत्ति।

अभ्यास – जन्य – अभ्यास से उत्पन्न।

दीर्घकाल – लंबे समय।

अतएव – इसलिए।

वाक् – वाणी।

प्रवृत्ति – स्वभाव।

सहाजात वृत्तियां – साथ – साथ चलने वाली क्रियाएं

विरोधिनी – विरोध या प्रतिकार करने वाली

यद्यपि – फिर भी, हालांकि

निर्बोध – अबोध, अनुभवहीन, अनजान

समानार्थक – समान अर्थ प्रकट करने वाले

व्यवहृत – प्रयोग में लाना, व्यवहार में आना।

अनुवर्तिता – अनुसरण करना।

समूची – सम्पूर्ण

अनजाने – बिना जानकारी के , जानकारी रहित।

नेता – लोकतांत्रिक प्रणाली में लोगों का नेतृत्व करने वाला व्यक्ति

अरक्षित – बिना सुरक्षा के, खतरा में।

महिमामयी – गौरवशाली, कृपापूर्ण ।

उत्तराधिकार – वंश परम्परा ।

विपुल – व्यापक।

उज्ज्वल – स्वच्छ, पवित्रतापूर्ण।

खास – विशेष

प्रेरणा – प्रोत्साहन,

उपकरण – यंत्र, यांत्रिक संसाधन

उलझन – जटिलता

मोह – अंधलगाव

भारी – गंभीर

आदर्श – प्रतिमान , जिसमें अनुसरण योग्य सभी गुण मौजूद हो।

अनुसंधित्सा  –  अनुसंधान के प्रबल इच्छा।

सरबस – सबकुछ।

भले लोग – सज्जन व्यक्ति।

मूढ़ – मुर्ख।

पूर्वसंचित भंडार – पहले से भरे भंडार/ पहले से संग्रहित खजाना।

सहज – सामान्य, सरल।

निद्रा – नींद ।

पशु-सुलभ – पशुओं के लिए उपयुक्त।

संयम – आत्मस्थिरता, आत्मनियंत्रण।

श्रद्धा – आस्था, भक्ति ।

तप – तपस्या।

उद्भावित – निर्मित।

निर्वैर भाव – वैररहित भाव, प्रेम भाव।

अन्यत्र (अन्य+त्र) – दूसरे संदर्भ में, दूसरे जगह।

सहानुभूति – अपनत्व, करुणा, संवेदना।

अहिंसा – हिंसारहित।

अक्रोधमूलक – क्रोधमुक्त, क्रोध रहित।

मूल – प्रमुख, असल ।

उत्स – उद्देश्य।

सर्वत्र – सभी जगह।

सदा – हमेशा।

मशीन – कारखाने, यांत्रिक उपकरण।

उत्पादन – निर्माण, निर्माण क्षमता।

मिथ्या – झूठ, असत्य।

द्वेष – शत्रुता, वैर भाव।

लोक – संसार।

आत्म-तोषण – आत्म-संतुष्टि, आत्मशांति।

उच्छृंखलता – उदण्डता, मनमानी, स्वेच्छाचारिता।

पैठकर – प्रवेश कर, पहुंचकर।

चरितार्थता– सार्थकता, चारित्रिक संपूर्णता।

तकाजा – आवश्यकता (फारसी शब्द)

घृणा – नफरत, निरादर पूर्वक अस्वीकृति।

द्योतक – देन, देनेवाला।

बाह्य – बाहरी।

आडंबर – दिखावा, दिखावे।

मैत्री – मित्रता।

मंगल – शुभ ।

नि:शेष – सम्पूर्ण।

एतद्धि विततं श्रेष्ठं सर्वभूतेषु भारत। निर्वैरता महाराज सत्यमक्रोध एव च।। श्लोक का अर्थ लिखें।

– हे महराज ! सभी जीवों में व्याप्त अशत्रुता, सत्य और अहिंसा के वास्तविक ज्ञान के कारण ही यह भारत श्रेष्ठ है।

‘नाखून क्यों बढ़ते हैं’ शीर्षक पाठ साहित्य की कौन सी विधा है?

– ललित निबंध

‘नाखून क्यों बढ़ते हैं’ शीर्षक ललित निबंध के निबंधकार कौन है?

– हजारी प्रसाद द्विवेदी

‘नाखून क्यों बढ़ते हैं’ शीर्षक पाठ का लेखक परिचय दें। हजारी प्रसाद द्विवेदी जी का परिचय दें।

हजारी प्रसाद द्विवेदी का जन्म कब और कहां हुआ था ?

– हजारी प्रसाद द्विवेदी का जन्म बलिया जिले के आरत दुबे के छपरा गांव में 1907 ई० में हुआ था।

हजारी प्रसाद द्विवेदी जी द्वारा रचित प्रमुख निबंध अथवा निबंध संग्रह कौन-कौन है?

– अशोक के फूल, कल्पलता, विचार और वितर्क, कुटज, विचार – प्रवाह, आलोक पर्व, प्राचीन भारत के कलात्मक विनोद आदि

हजारी प्रसाद द्विवेदी जी द्वारा रचित प्रमुख उपन्यास कौन-कौन है?

– हजारी प्रसाद द्विवेदी जी द्वारा रचित प्रमुख उपन्यास बाणभट्ट की आत्मकथा, चारुचंद्रलेख, पुनर्नवा, अनामदास का पोथा आदि है।

हजारी प्रसाद द्विवेदी जी की आलोचनात्मक और साहित्यिक इतिहास से संबंधित रचनाएं कौन-कौन – से हैं?

– हजारी प्रसाद द्विवेदी जी की आलोचनात्मक और साहित्यिक इतिहास से संबंधित रचनाएं सूर साहित्य, कबीर, मध्यकालीन बोध का स्वरूप, नाथ संप्रदाय, कालिदास की लालित्य योजना, हिन्दी साहित्य का आदिकाल, हिन्दी साहित्य की भूमिका, हिन्दी साहित्य : उद्धव और विकास आदि हैं।

हजारी प्रसाद द्विवेदी जी के निबंध संग्रह कौन-कौन से हैं?

– हजारी प्रसाद द्विवेदी जी के निबंध संग्रह संदेश राशक, पृथ्वीराज रासो, नाथ-सिद्धों की बनिया आदि हैं।

हजारी प्रसाद द्विवेदी जी को कौन – कौन सा सम्मान मिला है?

– हजारी प्रसाद द्विवेदी जी को ‘आलोक पर्व’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला है। भारत सरकार की ओर से ‘पदम्भूषण’ सम्मान और लखनऊ विश्वविद्यालय के द्वारा डी.लीट्. की उपाधि प्रदान किए गए हैं।

पाठ के आस – पास:-

अपने शिक्षक से देवराज इन्द्र और दधीचि मुनि की कथा मालूम करें।